फाकामस्ती

हां, रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन

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upendraswami


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बाकी मुंबई चुप क्यों है?

Posted On: 2 Feb, 2010  
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न्यूज़ बर्थ में

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साहित्य में (सैम) तंत्र

Posted On: 26 Jan, 2010  
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न्यूज़ बर्थ में

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स्ट्रॉंग मैन

Posted On: 22 Jan, 2010  
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न्यूज़ बर्थ में

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अवार्ड़ या छेड़छाड़ का लाइसेंस

Posted On: 6 Jan, 2010  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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महाब्लॉग

Posted On: 2 Jan, 2010  
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टेक्नोलोजी टी टी में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

उपेन्द्र बाबु आपने आकड़े सही से नहीं देखे है .... आज से १५ साल पहले लोगो को नौकरी चिराग ले कर ढूढ़ने से भी नहीं मिलती थी और सरकारी नौकरी के चक्कर मे भ्रस्ताचारिओ के हाथ की कठपुतली बन जाते थे....और गरीबी मे जीते थे ...और समाजवादी पानी से अपनी नाकामी को धोते रहते थे....गरीब सिर्फ वोह होता है जो पड़ना नहीं चाहता है.....सिर्फ समाजवाद से अपनी रोटी कमाना चाहता है....आजकल लोग समाजवाद का मतलब जानते ही नहीं है.....समाजवाद का मतलब होता है की आप खुद को पड़ा लिखा कर सबके बराबर पहुचे न की दुसरे को अपने जैसा बनाना.........उम्मीद है आप अब समझ गए होंगे....एक बात और अपने ज्ञान को सिर्फ अपने तक सिमित नहीं रखे उसको फैलाते रहे ब्लॉग लिख कर ....अंजना और बेनाम से कोई फायदा नहीं.......

के द्वारा:

वीरेंदर जी दुःख हुआ जन केर कि प्रधानमंत्री महोदय के अपमान का आपको बुरा लगा लेकिन एक सवा अरब कि आबादी वाले देश का प्रधानमंत्री किसी की चपरासीगिरी करे तो देश की प्रतिष्ठा ला क्या होगा.जिस प्रधानमंत्री की कुर्सी पैर पत.जवाहरलाल नहरू और इन्दिरागंघी जैसी हसियत के लोग बात चुके हो वह ऐसा लुंज--पुंज आदमी जो अपनी हेर प्रेस कांफ्रेंस में यही रटता रहता है कि राहुल गाँधी जब चाहेगे कुर्सी खली केर दुगा वैसे आदमी की क्या प्रतिष्ठा या अपमान वह तो छोड़ केर ही इस पद पैर ए है.जो कमी रह जाती है वह अमेरिका के आगे गिदगिड़ा केर पूरा कार्टर है.आपको भले न लगे लेकिन एक स्वाभिमानी आदमी को अपने सबसे बड़े नेता को चालीस साल के लड़के के आगे इस तरह डाट निपोरना कही से नहीं भाता.

के द्वारा:

beti ki izaat ghar ki izaat hoti hamrey desh ke har ghar ki pratikirya hai per kya maa-baap aaj kal beti bete ko surru meie isss paribhasha ko samjha patey ki kya jaati kya dharm kya gotr hai koi nahi jab unko kaho to woh isko nazar andaz kardey tey hai sawaal asia kyun jab kisi bad´burjg ka dabab padta tab achey baurey ki paribhasha yaad dilayjati hai surru se bachoon ko english medium school meie padyajata jahan per goter dahrm ka koi sawad nahi padya jata aaj ke mdoern youg meie hum ki soch kahain aur hai beti kahan jati hai kahan kis se doti kar rahi hai kisi maa-baap per time nahi bahut kam log hi hain asiey jo iss baat ki fikar kartey honengey per jab ladki shaadi layak hoti hai aur maa-baap ki ichha per naarajgi jatati hai tab uski baat ko unsuna kardeyti hai maa-baap ko izaat ka ? lagjata hai vastav meie galat hai maa-baap ko samjh daari ley kar beti ki shadi karni chhaiye yah nahi ki uss per koi dawab dalaajaye uss per atyachar kiya jaye usko maara jayae kyun nahi socha jata aaj ke samaj meie agar beti aapki marji shaadi karley aur wahin dusri aur ladka usko nakar dey tab kya karogey kya duabara haath piley karogey tab samaj meie aapke maan sammna ka kya hoga kis muhh se sab ka samana karogey beti ko beti hi samjho parya nahi jis beti ki chintaoko leyker uske haaath piley karney ka sapna dekhthey waqu aaney per ussey maarney ka kaamkar dala yeh kaisey maa-baap hain jara si bhi sharrm nahi rahi ki beti ki hatya karkey kaise iss paaap ki mukti se punay mileygadharm ke naam per jo betiyon ko jo maar detey ho yeh kis jagh sahi tharaya gaya hai beti ki hatya karney per koi inaam nahi milega parntu ultey paap ke bhagidaar hogeyasia na karo

के द्वारा:

इन पर कोई कब बोलेगा ? मगध महाविद्यालय कॉलेज, चंडी, नालंदा, बिहार जहाँ १०० से भी ऊपर शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारी कार्य करते है. वहाँ के प्राचार्य तथा शासी निकाय की तानाशाही तथा मनमाने ढंग से वित का दुरूपयोग करते हुए लगभग ३५ शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारीयो का वेतन नहीँ देने के चलते उनका तथा उनके परिवार भुखमरी के कगार पर पूरी तरह से हैं तथा शेष जिनका वेतन दिया भी जाता है वह कुल वेतन का नाममात्र का ही हिस्सा होता है. जिससे उनका भी भरण पोषण नहीं हो पा रहा है. माननीय मुख्यमंत्री के द्वारा दिए जा रहे लाखो रुपये अनुदान के अधिकांश भाग को प्राचार्य तथा शासी निकाय के द्वारा वेतन के रूप में जब्त कर लिया जाता है. कुछ लोगो को उनके वेतन का एक बहुत छोटा हिस्सा ही दिया गया तथा लगभग ३५ शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारियों को पूर्णतः वेतन नहीं दिया गया. इस कॉलेज के प्राचार्य की दबंगता इतनी है की इनके दर से कोई भी कर्मचारी अपना मुह तक नहीं खोल पाता है. पैसे की कमी तथा परिवार की भुखमरी इन कर्मचारियों की नियति बन चुकी है.

के द्वारा:

मनीष जी, मैं कलम की कमाई जरूर खाता हूं पर खुद को बुद्धिजीवी कम और आम नागरिक ही ज्यादा मानता हूं। इसलिए मुझे वह दृष्टिकोण अलग से लेने की जरूरत नहीं। मेरा बौद्धिक ज्ञान भी शून्य है। इसलिए मैं किसी चाहरदीवारी में कैद नहीं। इंसान को इंसान कहने के लिए वैसे भी किसी बौद्धिक ज्ञान की जरूरत नहीं होती। बंधु, राष्ट्रवाद और अंध राष्ट्रवाद में थोड़ा फर्क है। राष्ट्रवाद का मतलब यह नहीं कि गलत को गलत कहने वाले को गोली से उड़ा दिया जाए क्योंकि उसकी बातें कथित राष्ट्रवाद के सांचे में फिट नहीं बैठतीं। हां, आपकी इस बात से मैं सहमत हूं कि हमारे नेताओं में (राजनेताओं का स्तर उनका कहा) साहस की कमी है, वरना मसला कब का हल हो गया होता। आखिरी बात, किसको आप कैसे समझाएं यह तो इस निर्भर करता है कि आप किसको कितना समझते हैं और क्या समझते हैं और क्या आपकी समझ वाकई समझदार है। शुक्रिया!

के द्वारा: upendraswami upendraswami

उपेन्द्र जी पहले तो कैप्टन कोहली प्रकरण की विशेष और सही जानकारी न होने के कारण उनके प्रति भावों को वापस लेता हूं । दूसरे आफ़स्पा की ज़रूरत वर्तमान परिपेक्ष्य के मद्देनज़र कश्मीर से तत्काल न हटाया जाय, हमारी बहस इसपर केंद्रित रही है, इसपर नहीं कि कभी हटाया ही न जाय । हम भी मानते हैं कि कोई भी कानून जो दमनकारी हो, वह लोकतंत्र की सेहत के लिये कभी फ़िट नहीं बैठता । मुद्दा राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा से इतर हमारे लिये कुछ नहीं है । बाक़ी आप जैसे बुद्धिजीवी पत्रकार और सरकारी अमले का काम है कि जनसहयोग लेकर बहस चलाएं और अगर कानून में सचमुच कुछ खामियां हैं, तो उसे दूर करें । यह तात्कालिक योजना नहीं बल्कि दूरगामी होगी, क्योंकि कानून पुराना है, और सेना तथा सरकार द्वारा आजमाया हुआ भी । कश्मीरियों का दिल जीतने के लिये और क्या-क्या सुविधाएं बाक़ी रह गई हैं, जो देकर ही उनका दिल जीता जा सकता है, इसपर भी बहस की ज़रूरत पड़ेगी । इस दिल जीतने की प्रक्रिया में शायद उनकी मांग आए कि सिखों को तत्काल कश्मीर से बाहर किया जाय, और पंडितों की वापसी की कभी चर्चा भी कोई न करे, वरना वे खुश नहीं हो पाएंगे । इन संभावित मांगों का एक व्यापक एजेन्डा और फ़ेहरिश्त हम दिल्ली से ही तैयार कर अगले प्रतिनिधिमंडल को रवाना करें ताक़ि बच्चों को सही मरहम लगा सकें । धन्यवाद ।

के द्वारा:

शाही जी, दो दिन से वक्त न मिला तो जवाब न दे सका। हम जिसे कश्मीर की अभिन्नता के प्रति जनभावनाओं की आवाज मान रहे हैं, वह दरअसल प्रतिनिधि आवाज नहीं है। कश्मीर को आप भी देश का हिस्सा मानते हैं, मैं भी। लेकिन आप मानते हैं कि कश्मीर को देश का हिस्सा बनाए रखने के लिए पूरे कश्मीर को रौंदना भी पड़े तो कोई हर्ज नहीं। वहीं, मेरे जैसे लोग मानते हैं कि कश्मीर को रौंदना नहीं, उसे दिल से अपने साथ मिलाना होगा। जब तक हम इस भाव के साथ कश्मीर जाएंगे कि उन्होंने हमारी बात नहीं मानी तो हम कश्मीर को नेस्तानबूद कर देंगे, तब तक उन लोगों का दिल नहीं जीत पाएंगे। हम एक संवेदना के साथ उनके पास जाना होगा, तभी हम उन्हें अपने से जोड़ पाएंगे। विशेष अधिकार कानून को हटाना उसी संवेदना का हिस्सा होना चाहिए। यह धारणा बहुत गलत है कि इस कानून के चलते कश्मीर देश में बचा हुआ है। कैप्टन कोहली का प्रसंग कोई अकेला नहीं है, फर्जी मुठभेड़ करके तमगे लेने के ढेरों मामले कश्मीर में मिले हैं। यह मेरा कहना नहीं, आधिकारिक जानकारी है। (और कैप्टन कोहली फर्जी मुठभेड़ करने वाले नहीं, बल्कि फर्जी मुठभेड़ों को बेनकाब करने की कोशिश करने वाले थे। उनके जैसे और अधिकारी होने चाहिए सेना में..) जाट आरक्षण का प्रसंग इसलिए कि हम कैसे अलग-अलग चश्मे से स्थितियों को देखते हैं। निर्दोषों को आंच आने की बात पर आपको अब भी \'यदि\' लगाना पड़ा रहा है, इसी से साफ होता है कि हम अपनी बातों को लेकर कितने जड़ हो जाते हैं। रही बात कानून को तो, वह अपने चरित्र में ही लोकतंत्र-विरोधी है, इसलिए उसकी जगह तो देश के किसी भी हिस्से में नहीं होनी चाहिए, उसके लिए किसी संकट का बहाना नहीं होना चाहिए। यह सोचना कि AFSPA होने से कश्मीर भारत से जुड़ा रहेगा गलत है, उतना ही जितना की यह गलत है कि AFSPA हटाने से कश्मीर भारत से अलग हो जाएगा। शरीर को बीमार न पड़ने दें, एंटीबायोटिक की जरूरत नहीं पड़ेगी।

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उपेंद्रस्वामी जी आपके उक्त लेख के लिए धन्यवाद, मेरा यह मानना है की अति बुद्धिजीविता कभी कभी राष्ट्रवाद, समाजवाद के विरुद्ध काम करती है, और आपके लेख को भी मैं, कुछ अति बुद्धि जीवी की श्रेणी मैं ही रखता हूँ, कृपया आप अपने अति परिपक्व बौद्धिक ज्ञान की चारदीवारी से बहार आकर, एक सामान्य नागरिक के राष्ट्रवाद के दृष्टिकोण से सोचिये, आपको, कश्मीर समस्या और उसका समाधान नजर आ जायेगा. दूसरा तथ्य यह है की राजनेताओं में सहस की कमी या उनका स्वार्थ इस समस्या को जिवंत बनाए हुए हैं. एक तथ्य और भी है यदि आप किसी असामाजिक तत्व या आतंकवादी को अहिंसा के महत्त्व को समझाना चाहते हैं तो उसकी नाक पर एक कास कर घूंसा मारीये, अहिंसा उसकी समझ में अपने आप आ जाएगी.

के द्वारा:

ओमप्रकाश जी आपकी टिप्पणी उपरोक्त लेख पर पढ़कर दुःख हुआ की हमारे देश के माननीय प्रधानमंत्री जी का नाम आपने असम्मान के साथ लिखा आपकी विचारधारा कुछ भी हो चाहे कांग्रेस या बीजेपी या अन्य कोई पार्टी किन्तु प्रधानमंत्री जी का नाम तो सम्मान के साथ लिया जाना चाहिए ,विशेष कानून पर हमला करने से पहले जिन राज्यों में यह लागू है वहां की परिस्थिति को देखना चाहिए कश्मीर में अगर हिंसा और मरने मरने पर उतारू भीड़ पर गोली नहीं चलाई जाय तो क्या हमारे सुरक्षा बलों को उनके सामने मरने के लिए छोड़ दिया जाय या फिर कश्मीर ही पकिस्तान के हवाले कर दिया जाय आप लोग कल को कहेंगे की नक्सलियों पर भी गोली चलाना पाप है तो क्या पूरे देश के टुकड़े करके पकिस्तान ,चीन ,और खालिस्तान एवं नक्सलियों को सौंप दिया जाय........? नहीं .....ऐसा हरगिज़ नहीं हो सकता कश्मीर में हिंसा के लिए पकिस्तान समर्थक लोग जिम्मेवार हैं वहां हिंसा भी यी लोग ही फैला रहे है गोली का जवाब तो गुलाब के फूल से नहीं दिया जा सकता ...........?

के द्वारा: vijendrasingh vijendrasingh

अरविंद जी, पहली बात- अगर कोई बंदूक की नाल पर निर्दोषों को सेना की गोलियों के सामने कर देता है तो क्या सेना को उन निर्दोषों को गोली मार देनी चाहिए? कश्मीर में चार माह में सौ से ज्यादा लोग मारे गए। उनका क्या दोष था? उनमें बच्चे, महिलाएं.. सब शामिल थे। लिहाजा इसी से दूसरी बात निकलती है कि कश्मीर में चार माह में कितने प्रदर्शन ऐसे थे, जिनमें पीछे से कोई बंदूक की नाल पर लोगों को विरोध करने के लिए धमका या उकसा रहा था? कश्मीर में अनुच्छेद 370 के खिलाफ सबसे मुखर भारतीय जनता पार्टी तक के नेता यह कह रहे हैं कि कश्मीर में सारे प्रदर्शनकारी अलगाववादी नहीं थे। अब सवाल यह है कि जब आम आदमी यह शिकायत कर रहे हैं कि किसी कानून की आड़ में उनका उत्पीड़न हो रहा है तो सरकार को उनकी बात सुनकर उसपर विचार करना चाहिए या नहीं? वो भी जबकि सरकार के पास इस बात के प्रमाण हैं कि वाकई इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है। रही बात कश्मीर में रहने की तो, यह कानून तो देश के कई राज्यों में है, खास तौर पर पर्वतीय राज्यों में जहां बाहर के व्यक्ति आकर जमीन नहीं खरीद सकते और वहां के रिहाइशी नहीं बन सकते। खाली इस बात के लिए कश्मीर से वैर क्यों?

के द्वारा: upendraswami upendraswami

ओमप्रकाश जी, प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया। यह वाकई अफसोस की बात है कि जब हम सहज मानवीय चिंताओं को राष्ट्रवाद के चश्मे से देखना शुरू कर देते हैं तो हमें व्यवस्था का विरोध करने वाला हर व्यक्ति राष्ट्रद्रोही, आतंकवादी, माओवादी... नजर आने लगता है। ऐसे में सही-गलत के बीच फर्क बहुत बारीक हो जाता है। लोकतांत्रिक मूल्य दरकिनार किए जाने लगते हैं क्योंकि सत्ता अपने चरित्र से ही आधिपत्यवादी होती है। भ्रम की इसी स्थिति का फायदा दोनों पक्षों के वे लोग उठाते हैं जिन्हें आम लोगों की तकलीफ से कोई वास्ता नहीं, बल्कि अपना उल्लू सीधा करने से है- चाहे वो उमर अब्दुल्ला हों कांग्रेस या हुर्रियत कांफ्रेंस। कश्मीर के मसले पर इसीलिए बेहद सावधानी से और संतुलित तरीके से सोचने की जरूरत है, भावावेग से नहीं।

के द्वारा: upendraswami upendraswami

प्रिय श्री उपेन्‍द्र स्‍वामी जी, आपकी दूसरी बात का उत्तर । मेरी टिप्‍पणी में मुझे कहीं भी आम कश्मीरी को दंगाई कहने वाला शब्‍द नजर नहीं आया । ये आपके ही शब्‍द है । मैंनें केवल दंगाई शब्‍द का प्रयोग किया है । जो उन लोगों के लिए है जो बंदूक की नोक पर या किसी भी तरह से डरा कर निर्दोषों को सेना की गोलियों के सामनें कर देते हैं । जैसा कि मैंनें अपनी टिप्‍पणी में आगे लिखा भी है । ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आप अपने शब्‍द मेरे मुख से कहलाना चाह रहे हैं । अब पहली बात भारत में कहीं भी पर्यटक के रूप में जानें से आपकों विरोध का सामना नहीं करना पड़ता । यह हम अच्‍छी तरह जानते हैं और आप भी जानते हैं । लेकिन जब कानुन आपकों वहां टिकनें नहीं देना चाहता है तो आप कश‍मीरी कैसे बन पाएंगें । कशमीरी तो आप तभी बन सकते हैं जब आप कशमीर में स्‍थाई रूप से रहें । जैसें कि ना जाने कितने राजस्‍थानी व गुजराती आज बंगाल में बस कर बंगाली, आसाम में बस कर असमी हो गए हैं । वे अब अपनी मातृभाषा भी बंगाली व असमी ही लिखवाते हैं । मैंनें कशमीरियों को कहीं भी गलत नहीं समझा है लेकिन उनकी आड़ में छूपे भाड़े के टट्टू अवश्‍य दंगाई आतंकवादी है । इस बारे में सोच कर देखिये क्‍या ऐसे लोगों को आप गोली से उड़ा देने के पक्ष में नहीं है जो आपके घर को डरा-धमका कर कब्‍जा लें या कब्‍जाना चाहे । अरविन्‍द पारीक

के द्वारा:

उपेन्द्र जी मैं तो आपका धन्यवाद करते हुए पिछली बार ही अपनी बहस बन्द मान कर गया था, परन्तु आपने फ़िर वापस बुला लिया । लगता है कुछ लगाव हो गया है, जिसके कारण हम एकदूसरे को छोड़ने के लिये तैयार नहीं हो पा रहे हैं । वह भाषण नहीं था, कश्मीर की अभिन्नता के प्रति जनभावनाओं के प्रतिनिधित्व की आवाज़ थी । यह भी हो सकता है कि हम लोग दो विषयों को एक मानकर बेकार की बहस में उलझ गए हैं । आफ़स्पा नाम की बहस की मंज़िल पर शायद अलग-अलग रास्तों के राही टकरा गए । हम अपनी बहस के केंद्र में पहले दिन से ही कश्मीर से आफ़स्पा हटाने की स्थिति है या नहीं, इसको रख कर चले, और इससे अधिक हमें कुछ देखना भी नहीं था । आप उसको जाट आन्दोलन और कैप्टन कोहली प्रकरण से भी जोड़ रहे हैं । कश्मीर के वर्तमान मुख्यमंत्री को मैं व्यक्तिगत तौर पर डरपोक और अयोग्य मानता हूं, मैंने अपने कुछ लेखों में इसका ज़िक्र भी किया है । बेशक उन्हें यदि कुछ निर्दोषों पर आंच आई थी, तो उनके बीच जाकर उनके घावों पर मरहम लगाना था, जो कि उनका नैतिक और संवैधानिक कर्त्तव्य था । उन्होंने नहीं किया, क्योंकि अव्वल दर्ज़े के निकम्मे और भीरु स्वभाव के हैं । डर के मारे जलते कश्मीर से फ़रार होकर राहुल गांधी के साथ मैदानी इलाक़ों में घूम रहे हैं । इस बात का भारतीय संघ के साथ कश्मीर के रिश्ते का कुछ लेना देना नहीं है, कि उन्होंने अपना कर्त्तव्य पूरा नहीं किया, इसलिये आफ़स्पा हटा लिया जाय । इसी प्रकार कोहली मामला भी एक सैन्य अधिकारी की व्यक्तिगत सोच और कृत्य का मामला है । यदि आप मानते हैं कि सारे कश्मीरी अलगाववादी नहीं हैं, तो यह भी मानना चाहिये कि सारे सैन्य अधिकारी भी कैप्टन कोहली नहीं हो सकते । आफ़स्पा कानून के औचित्य के लिये कैप्टन कोहली और कमज़ोर मुख्यमंत्री के गैरज़िम्मेदाराना कृत्य का उदाहरण तर्क़ के रूप में प्रस्तुत करना, कश्मीर समस्या को बहुत छोटी दृष्टि से देखना कहा जाएगा । हम चाहे जितनी बहस कर लें, बात वहीं आकर थम जाएगी कि वर्तमान स्थिति में आफ़स्पा हटाकर क्या हम कश्मीर को भारतीय संघ का अभिन्न हिस्सा रख पाएंगे? जवाब होगा, \'नहीं\' । अब रोगमुक्त होने के लिये जब हम एंटी बायोटिक खाते हैं, तो वह शरीर के अच्छे या बुरे बैक्टीरिया की पहचान नहीं कर पाता, दोनों को समान रूप से मारता है । अच्छे बैक्टीरिया की कमी हम अलग से विटामिन की गोली लेकर पूरा करते हैं । आफ़स्पा को ज़रूरी एंटीबायोटिक के तौर पर ही देखना होगा । यदि न लें, तो रोग से मरना अवश्यंभावी हो जाता है ।

के द्वारा:

अरविंद जी, नीचे से बात शुरू कर रहा हूं। अनुच्छेद 370 हमारे ही देश की संवैधानिक व्यवस्था का एक अंग है। अगर वह लागू न किया गया होता तो कश्मीर भारत का हिस्सा बना ही नहीं होता और हम सबको यह कहने का मौका न मिला होता कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। फिर कश्मीरियों से घुलने-मिलने में अनुच्छेद 370 कैसे बाधक है, यह पेंच आपकी बात से मुझे समझ नहीं आया। मैं तो कश्मीर से नहीं लेकिन जब भी कश्मीर गया तो वहां के लोगों ने मुझे कभी परायेपन का अहसास नहीं होने दिया। दूसरी बात, आम कश्मीरी को आप दंगाई क्यों कह रहे हैं, यह भी मुझे समझ नहीं आ रहा। दोषी और निर्दोष में फर्क करना ही एक तो एक व्यवस्था का काम है। वो फर्क न हुआ तो अराजकता हो जाएगी। फिर कोई यह तो नहीं कह रहा कि कश्मीर में जो हो रहा है, वो होने दिया जाए। मेरा पक्ष तो केवल इतना ही है कि कश्मीर को हमें बंदूक के बल पर नहीं बल्कि दिलों को जीत कर अपने साथ रखना होगा। यह कश्मीर को समझाना होगा कि भारत में ही उनके सारो हित निहित हैं। गलती तब हम करते हैं जब कश्मीर को पाकिस्तान मानकर अपना रुख तय करने लगते हैं।

के द्वारा: upendraswami upendraswami

अच्छा भाषण बन पड़ा है, शाही जी। दाद दी जा सकती है। लेकिन मुद्दे से भटका हुआ है। हमारी कई राजनीतिक पार्टियां, संगठन यह भाषण कई सालों से देते आ रहे हैं। जो लोग राह चलते इंसान की मदद नहीं कर सकते, वे कश्मीर पर अच्छा भाषण दे सकते हैं। यह टिप्पणी आप पर नहीं, राजनीतिक दलों पर है, इसलिए अन्यथा न लीजिएगा। मेरी तरफ से कोई विषयांतर नहीं, न मुझे इतनी लंबी बातें कहनी आती हैं। सिर्फ कुछ पंक्तियां- कश्मीर पर सारा मौजूदा संकट आखिर पिछले चार महीने के घटनाक्रम की ही वजह से है न! आपने इतनी बातों में मेरी दो बातों का जवाब नहीं दिया, मुझे तो सिर्फ उनका जवाब चाहिए। पिछली प्रतिक्रिया से ही उद्धृत कर दे रहा हूं- "हिसार में जाट आरक्षण आंदोलन में एक आंदोलनकारी की मौत हुई तो मुख्यमंत्री तुरंत वहां गए, पांच लाख का मुआवजा दिया.. कुछ ऐसा ही हाल अलीगढ़-मथुरा के किसान आंदोलन में हुआ, दोनों ही जगह आंदोलनकारियों ने जमकर आगजनी की, हिंसा की, तोड़-फोड़ की। अगर कश्मीर को हम उतना ही अपना मानते हैं तो क्यों नहीं सुरक्षा बलों की फायरिंग में सौ लोगों के मारे जाने के बाद भी हमारे मुख्यमंत्री वहां गए, लोगों से मिले, उन्हें कोई तसल्ली दी? सेना हर गलती के लिए नहीं, लेकिन कुछ के लिए तो जिम्मेदार है ही। कैप्टन कोहली प्रकरण पर आप क्या कहेंगे?" इनका जवाब हो तो बेहतर है, वरना बहस बंद कर देनी चाहिए।

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स्वामी जी जनतांत्रिक भावनाओ की महत्ता को सर्वोपरी स्थापित करने की वकालत करने वाला लेख पठ केर तबियत प्रस्सन हो गयी वास्तव में बेशर्मी की हद है कि हाँ अपने को गम्धिवादी कहते है और मडिपुर के अधेड़ महिलाओ द्वारा इस कानून के विरोध में किये गए नग्न प्रदर्शन पैर शर्मिंदा होने क़ी स्थान किसी नेपोलियन और ,हिटलर क़ी तरह बेशर्मी क़ी हद तक अपने को जस्टिफाई करते है शर्मीला इरोम के उपवास की उपेक्चा केर गाँधी के मुह पर थूकते भी न तो हमें शर्म आती है न हमारी आत्मा हमें धिक्कारती है न्गुयेन न्गोक लोन को हम भूल चुके है लेकिन उनके द्वारा ली गयी जोकी वह तस्वीर आपको अवस्य याद होगी जिसे खीचने वाले को पुलित्जर पुरस्कार मिला था और मात्र उस एक तस्वीर ने विएतनाम युध्ध की दिशा और दशा को बदल केर रख दिया एक हमारे यहाँ अपने देश में अभी यही की एक आदिवासी महिलाजिसे माओवादी घोषित क़र उसकी .लाश को नंगी हालत में बांस पैर मरे जानवर की तरह लेजाते टी.वी.चैनलों पैर सबने देखा लेकिन उसपर सोनिया .मनमोहन और को ज्यादती तथा मानवता को शर्मसार करने वाले इस दृश्य को अपने विजय अभियान की तरह प्रदर्शित करने में गर्व कि अनुभूति हुई .जहा तक कश्मीर में बच्चो द्वारा पत्तथर फेकने का सवाल है तो यह सरकार का सरासर झूठा इल्जाम है कि सीमा पर से विदेशियो द्वारा धन दे क़र इसे अंजाम दिया जा रहा है जब कि यह विशुध्ध रूप से उन बच्चो द्वारा संचालित है जो इन्ही कानूनों के अनतेरगत पैदा हुए है अच्छे घरो के रहने वाले तथा अच्छे स्कुलो में पढ़ने वाले है लेकिन जो पैदा होने से पहले से ही परिचय पत्र के बगैर पैदा ही नहीं हो सकता तो इसतरह की व्यवस्था के खिलाफ कभी तो विद्रोह होना ही था और कश्मीर ने यही हो रहा है अब यह गिलानियो ,उमर फरुखो से भी आजाद है ये बच्चे अपना हक ले करही रुकेगे ऐसा ही इतिहास में होता रहा है और देर सबेर यहाँ भी होगा.

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उपेन्द्र जी अब हमारी बहस में विषयांतर और खिंचाव की स्थिति आ रही है, जो गैरज़रूरी है, और ऐसी स्थिति तभी आती है, जब कहने को दोनों पक्ष के पास कुछ और नहीं बचता । हर बहस या तर्क़-वितर्क़ में कुछ छुपे आशय आते रहते हैं, जो खामोशी से समझ लिये जाते हैं, अर्थात अंडरस्टूड होते हैं । कश्मीरी विद्रोहियों की संख्या इतनी नहीं है कि हमें अपनी सारी सेना झोंकनी पड़े, या 120 करोड़ की आबादी उनका प्रतिकार करने पहुंच जाय । मेरा आशय यह है, कि जो स्थितियां आती दिख रही हैं, उसमें यदि अलगाववादियों के किसी आह्वान पर विदेशी सेनाएं उनकी मदद को आ जाती हैं, जैसा कि वे छद्म आतंकवादियों के भेष में पूर्व से हैं भी, और क्या पता बड़ी सेनाएं भी कल को सामने आ जाएं, तो हम मुंह की खाकर पीछे हटकर सुलह समझौते जैसी कायरता सरकार को नहीं करने देंगे । मर जाएंगे, लेकिन कश्मीर नहीं देंगे । वहां हमारे विवेकशील तर्क़ काम नहीं करेंगे जो आदमी को कायर बनाते हैं, बल्कि विशुद्ध भावनाएं होंगी जिनका एक ही मक़सद होगा, कि परमाणु युद्ध भी करना पड़े, तो करेंगे, अपने देश का टुकड़ा किसी कीमत पर नहीं देंगे । वैसे भी आततायी घाटी को खून से लाल करते रहे हैं, और हमने टुकुर-टुकुर देखने के अलावा अभी तक कुछ किया नहीं है । अभी भी आपको कोई खतरा नहीं दिख रहा उपेन्द्र जी, मानवाधिकार की बात कर रहे हैं, जबकि पाकिस्तान ने अभी कल भी हमें ललकारते हुए नसीहत दी है कि अब कश्मीर पर से दावा छोड़ दें । अब ऐसा नहीं होगा, क्योंकि देश जाग चुका है, भले किसी को दिखाई न दे रहा हो । वह जनभावनाएं ही हैं, जिसकी वजह से कल फ़ैसला टला है । अब यह अन्दरूनी खेल भी बहुत दिनों तक चलने वाला नहीं है । हर चीज़ की एक हद होती है, और अब वह पार कर रही है । ‘जाग उठा है देश ये सारा दृढ संकल्प की बारी है – स्वाभिमान जगा भारत का नवयुग की तैयारी है’ । आप भी तैयार रहिये उपेंद्र जी । आने वाले कल का मक़सद होगा कि सारे विशेषाधिकार समाप्त कर घाटी में भारत बसाया जाय, क्योंकि इस समस्या के अंत का यही एकमात्र रास्ता है । कश्मीरी पंडित अनन्तकाल तक अपनी भूमि से अलग नहीं रहेंगे, न ही वहां के सिखों और बौद्धों को अपना धर्म परिवर्त्तन करने की नौबत आने देंगे । कश्मीरी मुसलमान जो देशभक्त और निर्दोष हैं, कोई पागल ही होगा जो उन्हें भी अलगाववादियों की श्रेणी में रखकर देखेगा । लेकिन उनके बीच में फ़ंसे हुए हैं, तो सामयिक रूप से परेशानी झेलने से उन्हें हम नहीं बचा सकते । इस बहस में अब कोई तर्क़ नहीं रहा । कश्मीर हमारा था, हमारा है, और हमारा रहेगा । चीन और पाकिस्तान संयुक्त प्रयास करके भी अब हमारे ज़मीन का और टुकड़ा नहीं कर सकते । हमें मिटाकर करना चाहेंगे, तो खुद भी मिटेंगे । पहले और आज की स्थिति में फ़र्क़ है । 62 में हमारा देश अभी घुटनों के बल रेंग रहा था, जब ड्रैगन ने ज़मीन हथियाई थी । आज वह जानता है कि उसके पास अगर दिल्ली तक मार करने वाली मिसाइलें हैं, तो हमारी पहुंच भी बीजिंग तक हो चुकी है । हमारी कमज़ोरियां सिर्फ़ हमारी राजनीति में समाया हुआ भ्रष्टाचार है, जिसके कारण नैतिक बल में हम तुलनात्मक रूप से चीन से पीछे हैं । इस कमज़ोरी से पीछा छुड़ाना हमारे अपने हाथ में है । वह आज हमसे ताक़तवर ज़रूर है, लेकिन जानता है कि हम भी आज 62 जैसे कमज़ोर नहीं हैं, कि टकराकर आसानी से बिना अपना नुकसान उठाए हमें धूल चटा देगा । रही बात पाकिस्तान की, तो वह हमेशा हमारे सामने पिद्दी ही रहेगा । प्राँक्सी वार से अधिक न वो कर पाया है, न कर पाएगा । आफ़स्पा कानून एक सामयिक ज़रूरत है, सामरिक नहीं । और न ही अपने नागरिकों पर नाहक़ ज़ुल्म ढाने के लिये बना है । अलगाववादी हों या छद्मवेश वाले पाकिस्तानी आतंकवादी, हमारा डायलाँग वही रहेगा – ‘दूध मांगोगे, खीर देंगे- कश्मीर मांगोगे, तो चीर देंगे’। धन्यवाद उपेंद्र जी ।

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प्रिय श्री उपेन्‍द्र स्‍वामी जी, श्री के.एम. मिश्रा जी के आलेख कश्‍मीर भारत का अभिन्‍न अंग है से आपके इस लेख के बारे में पता चला । अब पढ़ा तो पता चला कि उन्‍हें इस लेख ने विचलित क्‍यों किया । आप कहते हैं कि सेना को काम करने के लिए इस कानुन की क्‍या जरूरत है । तो क्‍या आप समझते हैं कि केवल सैनिकों के सड़कों पर पूलिस वालों की तरह घूमनें से दंगाई डर जाएंगें । या आपकी नजर में कश्‍मीर में जो हो रहा है वह होने दिया जाए उसे किसी भी तरीके से न दबाया जाए । यह खामियाजा हम केवल इस बात का भूगत रहे हैं कि हमनें कभी भी पुरे कश्‍मीर को एक करने की कोशिश ही नहीं की है । 1949 में ही यदि यह कोशिश कर ली जाती तो आज जैसी समस्‍या पैदा ही नहीं होती । आप कानुन का विरोध करना चाहते हैं या सरकार की कानुन लागू करने की नीति का । सरकार अपना काम सेना के सर पर डाल कर दूर बैठी तमाशा देख रही है । उधर पाकिस्‍तान भी अब गाहे-बगाहे आपके सुर से सुर मिला कर इस कानुन के बारे में बोलनें लगा है । जबकि यह भारत का अंदरूनी मामला है । मेरे विचार से तो जो आतंक फैलाते हैं उनके मानवाधिकार स्‍वत: ही समाप्‍त हो जाते हैं । हां वो बंदूक की नोक पर या किसी भी तरह से डरा कर निर्दोषों को सेना की गोलियों के सामनें कर देते हैं, ऐसे में कोई सैनिक यदि आतंकी और आम् आदमी के बीच फर्क के चक्‍कर में पड़ा तो वहीं साफ हो जाएगा । जहां तक मनोवृति बदलनें की बात है वह केवल धारा 370 की समाप्ति के बाद ही मुमकिन है । क्‍योंकि तभी अन्‍य प्रदेशों के लोग आम कश्‍मीरी से घुलमिल पाएंगें वहां सम्‍पति बना पाएंगें । जब वहां ऐसा भाईचारा बढ़ेगा तभी मनोवृति भी बदलेगी । इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि केवल सेना को विशेषाधिकार कानुन से वंचित करके हम कश्‍मीर में शांति स्‍थापित कर पाएंगें । कश्‍मीर भारत का अभिन्‍न अंग है व उसकी सुरक्षा व रक्षा के लिए हर जायज कदम उठाया ही जाना चाहिए । अरविन्‍द पारीक

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शाही जी, कश्मीर की भी बात करें तो अफसोस कि हमारी ठीक यही सोच वहां के लोगों को हमसे दूर कर रही है। यानी कश्मीर पर नियंत्रण रखने के लिए हम जिस नीति पर चल रहे हैं, वही नीति दरअसल उन लोगों को हमने परे कर रही है। हमने कश्मीर को पाकिस्तान मान लिया क्योंकि वहां कुछ पाकिस्तान-परस्त लोग हैं। इसलिए सारे कश्मीर हमारे दुश्मन हो गए। जब हम सेना झोंकने और 120 करोड़ लोगों को सीमा पर खड़े करने की बात कर रहे हैं तो वह कश्मीर के पार की बात कर रहे हैं। लेकिन हमारे जेहन में यह तर्क काम कर रहा है कि पूरा कश्मीर दुश्मन देश है। कश्मीर और पाकिस्तान में फर्क नहीं करेंगे तो कभी इस समस्या को सुलझा नहीं पाएंगे। आपकी आखिरी पंक्ति भी वही सोच दिखाती है, हमारा संविधान कश्मीरी लोगों को विशेष सुविधाएं दे रहा है, अलगाववादियों को नहीं। हमारे आधे सांसद भ्रष्ट हैं, अपराधी हैं- तो क्या हम पूरी संसद को फांसी चढ़ा देंगे? सजा कश्मीरी लोगों को क्यों देना चाह रहे हैं। मेरी एक बात का जवाब दीजिए- हिसार में जाट आरक्षण आंदोलन में एक आंदोलनकारी की मौत हुई तो मुख्यमंत्री तुरंत वहां गए, पांच लाख का मुआवजा दिया.. कुछ ऐसा ही हाल अलीगढ़-मथुरा के किसान आंदोलन में हुआ, दोनों ही जगह आंदोलनकारियों ने जमकर आगजनी की, हिंसा की, तोड़-फोड़ की। अगर कश्मीर को हम उतना ही अपना मानते हैं तो क्यों नहीं सुरक्षा बलों की फायरिंग में सौ लोगों के मारे जाने के बाद भी हमारे मुख्यमंत्री वहां गए, लोगों से मिले, उन्हें कोई तसल्ली दी? सेना हर गलती के लिए नहीं, लेकिन कुछ के लिए तो जिम्मेदार है ही। कैप्टन कोहली प्रकरण पर आप क्या कहेंगे?

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प्रीतम जी, मैं सारे अपराध निरोधी कानून को हटाने की बात नहीं कर रहा केवल एएफएसपीए की बात कर रहा हूं क्योंकि यह जवाबदेही मुक्त निरंकुशता व उत्पीड़न की गुंजाइश छोड़ता है। अन्य कोई कानून इस तरह से जवाबदेही मुक्त नहीं है। मैं एएफएसपीए हटाने की आवाज उठाते हुए भी इंसान के इंसान बनने की तमन्ना रख सकता हूं और रखता ही हूं, क्योंकि मेरे लिए उन दोनों चीजों में कोई अंतरविरोध नहीं है। एएफएसपीए हटाने से लोग आतंकवादी बन जाएंगे, यह धारणा गलत है, अलबत्ता यह कानून लगाकर हम लोगों में शासन के प्रति कटुता बेशक पैदा कर रहे हैं। मैं अभी तक यह नहीं समझ सका हूं कि इस कानून को लगाकर हमने देश के किस कोने में कोई सुखद स्थिति कायम कर ली है। इसका विरोध किसी आतंकवादी के पक्ष में नहीं बल्कि आम लोगों के पक्ष में है।

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उपेन्द्र जी अगर आपका आफ़स्पा हटाने से सम्बंधित लेख कश्मीर के संदर्भ में नहीं था, तब तो हम इस बहस का पटाक्षेप ही कर दें । हम इस वक़्त कश्मीर और सिर्फ़ कश्मीर की बात कर रहे हैं, मैं मिश्रा जी या बाजपेयी साहब कोई भी । यह हर क़ीमत पर सुनिश्चित हो जाना चाहिये कि कश्मीर हमारा अभिन्न अंग बना रहेगा । यहां मैं या कोई भी आम भारतीय मानवाधिकार के नाम पर अपने भूखंड के शीर्ष को गंवाने की बात का समर्थन नहीं कर सकता, भले हमें आफ़स्पा से भी कड़े क़ानून क्यों न बानाने पड़ें, देश की पूरी सेना झोंककर युद्ध ही क्यों न लड़ना पड़े, या पूरी 120 करोड़ की जनता को सीमाओं पर चढ़कर दुश्मनों से आमना सामना क्यों न करना पड़े । हम कश्मीर किसी भी स्थिति में हाथ से नहीं जाने दे सकते उपेंद्र जी । वहां चिदम्बरम जी जाकर नहीं मिले, तो क्या वे लोग चिदम्बरम का इंतज़ार कर रहे थे जिन्होंने बाक़ी के नेताओं से मिलने से इंकार करते हुए सिर्फ़ और सिर्फ़ आज़ादी लेने की बात की? कहीं अंजाने में हम अपनी सेना पर यह आरोप तो नहीं लगा रहे कि जो स्थिति आज बनी है, वह सेना की कारस्तानी है । उस धरती पर जब भी पहल हुई है, आतंकवादियों और अलगाववादियों द्वारा ही खुराफ़ात की शुरुआत की गई है, फ़िर सेना तो अपना काम करेगी ही । दूसरे राज्यों में जहां आफ़स्पा लागू है, वह एक अलग बहस का विषय हो सकता है वहां की परिस्थितियों के आधार पर । अगर राजनीतिक बातचीत से कश्मीर में सचमुच कोई सकारात्मक हल निकलता है, तो वह स्वागत योग्य होगा, लेकिन पहले से ही अनगिनत सुविधाएं प्राप्त कर रहे अलगाववादियों के आगे घुटने टेक कर यदि कुछ भी और परोसने की कोशिश की गई, तो हमारे लिये आत्मघाती होगा ।

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शाही जी, मैं यह बात पहले भी कह चुका हूं कि सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून पूर्वोत्तर के राज्यों में पचास से भी ज्यादा साल से है और वहां लगातार उसका विरोध होता रहा है। शर्मिला के बारे में मैंने बताया जो दस साल से इसके विरोध में अनशन पर हैं। कुछ साल पहले वे दिल्ली भी आईं, विरोध किया, पुलिस ने जबरन एम्स में भर्ती कराया और फिर मणिपुर भेज दिया। इस कानून का विरोध न कोई पहली बार हो रहा है और न केवल कश्मीर के संदर्भ में हो रहा है। इसका विरोध समग्र रूप में लगातार होता रहा है। इसलिए खास तौर पर कश्मीर के लिए कुछ कहा जा रहा है, ऐसा नहीं है। यह बात तो मेरी मूल पोस्ट में भी स्पष्ट थी। अब बात कश्मीर की। क्या कश्मीरियों का यह सवाल जायज नहीं कि कश्मीर में चार महीनों में सौ लोगों के मारे जाने के बाद क्यों सरकार को वहां शिष्टमंडल भेजने की याद आई? क्या यह काम विरोध की पहली घटना के बाद ही नहीं हो जाना चाहिए था? और फिर विरोध की बात ही क्यों, कश्मीर को लेकर इतने सालों में क्यों नहीं कभी वहां जाकर आम लोगों से मिलकर बात की गई? क्या सरकार की शान में गुस्ताखी हो जाती अगर चिदंबरम खुद गिलानी, फारूक व मलिक से मिलने पहुंच जाते? आखिरकार हम देश के सामने खड़े सबसे बड़े संकट को सुलझाने की बात कर रहे हैं तो सरकार क्या अपनी तरफ से दो कदम आगे नहीं चल सकती थी? बातचीत को खुले दिल से तैयार तो हों, तो सारे मुद्दों की बात हो, कश्मीरी पंडितों की भी बात हो। लेकिन अगर हम तय ही कर चुके हों कि समाधान सिर्फ बंदूक से ही हो सकता है तो रास्ता कैसे निकलेगा। चीन ने थ्येन आनमन में जो किया, उसका पक्ष आप भले ही लें, मैं नहीं ले सकता। शक्ति बनने का वो कोई रास्ता नहीं और चीन केवल उसके बूते है भी नहीं।

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रमेश जी,  पहली बात, जवानों के पर कतरने की बात मैं नहीं कर रहा। मैं एक ऐसे कानून को हटाने के पक्ष में उठ रही आवाज में अपनी आवाज मिला रहा हूं जो सुरक्षा बलों को ऐसे निरंकुश अधिकार देता है, जिनकी लोकतंत्र में जगह नहीं होनी चाहिए। कानून का इतिहास बताता है कि उसका लगातार दुरुपयोग हुआ है- चाहे खुद सेना द्वारा या उसके राजनीतिक आकाओं द्वारा। देश के हर नागरिक की तरह जवान हमें भी उतने ही प्यारे हैं। दूसरी बात, आपकी बात से लगता है कि कश्मीर के लोग आपके लिए जिगर के टुकड़े नहीं हैं। कश्मीर के प्रति यही संदेह सारी मुश्किलों की जड़ है। अगर आपको लगता है कि कश्मीर घाटी में पिछले चार महीने से सड़कों पर उतर रहे सारे लोग, महिलाएं व बच्चे 800 रुपये दिहाड़ी के पत्थरबाज हैं, तो माफ कीजिए आपकी जानकारी या तो बेहद कमजोर है या फिर केवल कही-सुनी बातों पर आधारित है? यह सोच हमें कश्मीर संकट को हल करने नहीं देगी।

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रामकुमार जी, आपकी बातों पर कुछ सवाल आपसे- पहली बात, कठोर व्यवस्था का मतलब क्या किसी निरंकुश कानून से है? क्या सुरक्षा बलों की कानून के तहत कोई जवाबदेही नहीं होनी चाहिए? दूसरी बात, स्थिति के नियंत्रण में होने की आपकी परिभाषा क्या है- कर्फ्यू लागू होना, सड़कों पर बंदूकें लहराते जवानों का घूमना? कश्मीर को तो हम हमेशा से इसी तरह काबू में करते आए हैं। क्या सेना ही हर बात का जवाब है? तीसरी बात, क्या कानून लगाकर हम उन लोगों की मनोवृत्ति बदल पाए हैं जिनका किसी किस्म के अलगाववाद अथवा आतंकवाद से कभी कोई संबंध नहीं था? क्या हमने उनको भी दूर नहीं कर दिया है? चौथी बात, सरकार का तंत्र कमजोर है तो क्या सेना देश में सरकार के विकल्प के तौर पर खड़ी हो रही है, यानी जहां सरकार कमजोर वहां, सेना का इस्तेमाल? पांचवी बात, उचित समय की हमारी परिभाषा क्या है? खुद सेना की मानें तो कश्मीर में आतंकवादी घटनाएं पिछले एक साल में काफी कम हुई हैं। क्या केवल यह कानून कश्मीर को देश से जोड़े रखने में कामयाब होगा?

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उपेन्द्र जी थोड़ी देर से देख पाया, इसके लिये खेद है । देखिये अपने देश के नागरिकों, चाहे वो कश्मीरी हों या कोई और, मारकर अपनी बात नहीं मनवाई जा सकती, आपका यह कथन सही है । तो क्या दूसरे राज्यों के उग्रवादी हमारे नागरिक नहीं हैं? हम उन्हें मारने अथवा उनका उन्मूलन करने की योजनाएं आखिर क्यों बना कर भिड़े हुए हैं? इसीलिये न कि स्वदेशी होते हुए भी वो हमारी संवैधानिक व्यवस्था को मानने से इंकार करते हैं, और यह कि हिंसक हैं? तो वहां कश्मीर में ऐसी क्या खास बात है कि वहां की हिंसक भीड़ जो उग्रवादियों की तरह ही हमारी संवैधानिक व्यवस्था को मानने से इंकार कर रही है, और मरने मारने पर उतारू है, वहां से सख्ती हटा ली जाय, क्यों? शिष्टमंडल गया तो है कश्मीर और जम्मू भी । क्या हुआ है वहां, मुझसे ज़्यादा जानकारी आपके पास होगी । गिलानी सहित तीनों मूर्तियों ने टका सा जवाब दिया है कि हमें सिर्फ़ और सिर्फ़ आज़ादी चाहिये, बिजली पानी और सड़क नहीं । जम्मू में अलग तरीके का विरोध हुआ कि सारी मानमनव्वल सिर्फ़ वहीं क्यों, कश्मीरी पंडितों को विश्वास में लिये बिना वार्ता का औचित्य क्या है? अब बताइये उपेंद्र जी क्या गलत कह रहे हैं कश्मीरी पंडित? जो अवाम हमारे साथ रहने के लिये तैयार नहीं है, उसे सारी सुविधाओं सहित हमें तुरन्त सख्ती छोड़कर तश्तरी में सजाकर अलग मुल्क घोषित करवा देना चाहिये । यदि यही मानवाधिकार की असली और लाभदायक परिभाषा होगी, तो फ़िर हमारी बहस बेकार ही है । चीन ऐसे ही आगे नहीं बढ़ गया उपेंद्र जी, थ्येनआनमन चौक पर यदि उसने छद्म मानवाधिकार का मुंह देखा होता, तो आज शायद इलाक़े की महाशक्ति नहीं होता ।

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प्रीतम जी, अलंकार आपकी-हमारी भाषा में हो सकते हैं, लोगों की जिंदगियों में नहीं। भाषा जैसी हो, बात को असर करना चाहिए। कश्मीर का एक उदाहरण पहले भी दे चुका हूं। कश्मीर में निर्दोष लोगों को मुठभेड़ में मारने की घटनाओं को बेनकाब करने वाला कैप्टन कोहली संदेहास्पद तरीकों में मारा गया। उनकी मां का कहना है कि उसे साथी अफसरों ने मार डाला। चार साल बाद रक्षा मंत्री ने उसकी फिर जांच का आदेश दिया है। इस पर क्या कहेंगे आप? फर्जी मुठभेड़ करके तमगे हासिल करने की घटनाएं कश्मीर में कोई इक्का-दुक्का नहीं हैं। कुछ दिन पहले के अखबार आपने देखें हों तो मणिपुर की एक घटना फोटो के साथ प्रकाशित थी, जिसमें सुरक्षा बल एक निहत्थे जवान को एक दुकान में ले गए और थोड़ी देर बाद उसकी लाश वहां से निकली। कैसे रोकेंगे आप इसे? सुरक्षा बलों को उनके कामों के लिए जवाबदेह तो बनाना होगा। वे राजनीतिक हथियार तो नहीं बनने दिए जा सकते।

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आदरणीय उपेन्द्र जी, यकीनन आपकी बात काफी कुछ सही है जिसके लिए आप बधाई के पात्र हैं. किंतु कुछ ऐसे तथ्य हैं जिनकी अनदेखी कैसे की जा सकती है. यथा: 1. अलगाव को हवा देने वाले तत्वों पे लगाम लगाने का सही प्रयास कैसे किया जा सकता है बगैर किसी कठोर व्यवस्था के? 2. जब इतने कठोर कानून को काश्मीर में लागू किया गया तो स्थिति निश्चित रूप से नियंत्रण में है लेकिन उससे पूर्व जबकि ऐसा कोई रेगुलेशन वहॉ पे लागू नहीं था तब क्यूं अलगाववाद को हवा मिल रही थी? 3. क्या भारत विरोधी प्रचार वाले दस्तावेजों, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की कश्मीर मामले पे अनावश्यक दखल और आतंकी समूहों की मनोवृत्तियों में इस कानून के वहॉ से हटा लेने पे कोई परिवर्तन आ जाएगा? 4. भारत सरकार का प्रचार तंत्र कश्मीर मामले पे केवल रक्षात्मक स्वरूप का है. ऐसे में क्या अलगाववाद की आग और नहीं भड़क जाएगी? 5. क्या इस कानून को वहॉ से हटाने का उचित समय आ चुका है? कहीं हम सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानून की खिलाफत करके कश्मीर खो तो नहीं देंगे?

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मिश्रा जी, शाही जी, रमेश जी! मुझे लगता है कि कश्मीर को देखने का हमारा नजरिया बहुत सीमित व एकतरफा है- अनुच्छेद 370, कश्मीरी पंडित.. वगैरह, वगैरह। मिश्रा जी का कश्मीर के लोगों को कीड़े-मकोड़े, खटमल कहना दर्शाता है कि हम किस सोच के साथ इस चुनौती का सामना कर रहे हैं। क्या कश्मीर के सारे लोगों को ठिकाने लगाकर कश्मीर पर नियंत्रण बनाए रखने में हमें गर्व होगा या एक फलते-फूलते कश्मीर को साथ लेकर चलते हुए गमें गर्व होगा- जवाब तो इस सवाल का ढूंढना है। शाही जी का यह कहना भी गलत है कि इस मसले को अब उठाने में कोई निहितार्थ हैं। अगर आम लोगों को तसल्ली देना कोई निहितार्थ है, तो वह बेशक कभी भी हो सकता है। लेकिन मैंने अपनी मूल पोस्ट में लिखा था कि मणिपुर में इरोम शर्मिला तो दस साल से इस कानून के खिलाफ अनशन पर हैं। एएफएसपीए का विरोध तो काफी समय से हो रहा है, बस ज्यादती होती है तो गूंज ज्यादा सुनाई देने लगती है। इसी तरह अनुच्छेद 370 का इस्तेमाल भी सिर्फ राजनीतिक विरोध के लिए होता है। कश्मीर को विशेष अधिकार प्राप्त है तो उसका क्या नुकसान बाकी देश को हुआ, इसका किसी के पास कोई तर्क नहीं, इसके सिवाय कि अनुच्छेद 370 का फायदा उठाकर कश्मीर में आतंकी पनप रहे हैं। कश्मीर के भारत में विलय की स्थितियों व शर्तों की कोई बात नहीं होती। और फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि हम कश्मीर के लोगों को दिल से जोड़ने की बात कर रहे हैं या उनकी छाती पर पैर रखकर उन्हें रौंदने की।

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उपेन्द्र जी , आपका कहना बिलकुल सही है | देश में आज जितने भी क़ानून हैं , वे ईमानदारी से और बिना किसी भेदभाव के लागू किये जाएँ तब भी परिस्थितियों में आमूल परिवर्तन आ सकता है | भारत के अंदर कश्मीर की स्थिति बिलकुल भिन्न है | उसे विशेष राज्य का दर्जा ,धारा ३७० का संरक्षण अवश्य दिया गया , पर सच मायने में नवें दशक तक वह एकदम निगलेक्तेड रहा ,जहां विकास के नाम पर टूरिस्ट और सेना का जमावड़ा ही प्रमुख रूप से रहा करता था | कश्मीर की तुलना हम देश के आदिवासी इलाकों से कर सकते हैं , जहाँ आजादी के बाद देश के शासक , प्रशासक , व्यापारी और संपन्न वर्ग ने लूट खसोट तो बहुत की लेकिन विकास की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया और आज नतीजा माओवाद के नाम पर निरीह आदिवासी और देश की जनता उठा रही है | आखिर इतनी फोज की तैनाती , गोला बारूद , सभी का खर्चा , वह चाहे कश्मीर हो या आदिवासी इलाका , उठाना तो आम जनता को ही पडता है | आज तक सरकारों , सेना , पोलिस ने जितने भी विशेषाधिकार लिये हैं , उनका दुरुपयोग अपने अधिकारों के लिये लडने वाली जनता और उसके प्रतिनिधियों के खिलाफ ही हुआ है | कश्मीर आज समस्या इसलिए है कि भारत की आजादी के समय उस समय के राजनेताओं ने कुछ ऐसी भयानक गलतियां की थीं , जिनका आज उल्लेख करने से तथाकथित राष्ट्र प्रेमी बचते हैं | कश्मीरियों का दिल जीते बिना कश्मीर का समाधान नहीं है | वैसे आपका विषय सेना को कोई भी इस तरह का विशेषाधिकार देने के खिलाफ था , मैं उसमें आपसे इत्तिफाक रखता हूँ |

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शाही सर प्रणाम । अनुच्छेद 370 का विरोध उतना ही पुराना है जितनी कश्मीर समस्या पुरानी है । गलत राजनैतिक लाभ लेने के लिये और तुष्टीकरण की नीतियां किस हद तक आत्मघाती होती हैं यह इसका साफ उदाहरण है । हमने कश्मीर सहित कई राज्यों को 370 की बैसाखी दे दी । आप देखें कि इस बैसाखी का प्रयोग जम्मू कश्मीर में सिर्फ कश्मीर घाटी के लिये ही होता है जम्मू और लद्दाख के इलाकों के वो सुविधा नहीं दी जाती है । कश्मीर घाटी जम्मू कश्मीर का मात्र एक छोटा सा हिस्सा है । 2/3 कश्मीर जम्मू और लद्दाख में बसता है । कश्मीरियत की बात होती है तो सिर्फ घाटी के 7,8 जिलों के लिये । क्या जम्मू में बसने वाले हिंदू और सिख और लद्दाख में बसने वाले बौद्ध कश्मीरी नहीं हैं । 370 का काला अनुभव यह कहता है कि इन राज्यों को हमने विशेष दर्जा देकर उनको आम भारतीयों से दस फिट ऊपर बैठा दिया । अब वे स्वायत्ता और उसकी आड़ में स्वतंत्रता की बात करते हैं पाकिस्तान के इशारों पर । वहां न हमारा संविधान लागू होता है और नहीं हमारा तिरंगा । कुल मिलाकर अनु0 370 ने ही उनको न भारतीय होने दिया और न ही उस क्षेत्र को भारत का हिस्सा मानने दिया । अनु0 370 ही मामले की असली जड़ है । शांति की बात वही समझता है जो शांति से रहना चाहता है । मगर जो अपने आप को स्वतंत्रता सैनानी समझता है वह भारत के खिलाफ युद्ध छेड़े हुये है और युद्ध के नियम सदा से ही दूसरे होते हैं ।

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विशेष सशस्‍त्र बल कानून का एक दूसरा पक्ष भी है । वह पक्ष है कश्मीर और पश्चिमोत्तर जैसी स्थितियों को पूरे भारत में फैलने से रोकना । अनु0 370 का मजा लूटने वालों और कश्मीर को भारत से अलग करने वालों के लिये ही विशेष सशस्‍त्र बल कानून की जरूरत पड़ती है । कश्मीर घाटी में पाकिस्तान का झंडा लहराने वालों और इसी भारतीय संविधान को रद्दी से ज्यादा न मानने वालों को के लिये अनुच्छेद 21 की बात करना बेमानी होगी । उपेन्द्र जी सत्ता और यह दुनिया हमेशा से सिर्फ अच्छी अच्छी नीतियों से नहीं चलती हैं । आज पंजाब शांत है तो उसके लिये इंदिराजी का वह दमनकारी रूप इसका कारण है और कश्मीर अशांत है तो वह इसलिये क्योंकि वहां पर भारत की अखण्डता को चूनौती देने वाले खटमालों को दमन नहीं किया जा रहा है । सारे कीड़े मकोड़ों को साफ करके के पश्चात ही वहां शांति प्रिय देश की नीतियों लागू हो सकती है । इन खटमलों का एक ही उद्देश्य है कश्मीर को अलग कर के भारत की अखंडता पर हमला । अमरनाथ यात्रा आप बड़ी जल्दी भूल गये । इसके अलावा कश्मीरी पण्डितों के साथ क्या किया गया और आज सिख और बौद्धों को किस तरह से धर्मपरिर्वतन के लिये धमकाया जा रहा है । और रही मूलाधिकार की बात तो मूलाधिकारों का कितना पालन इस देश में हो रहा है ये भी तो आप अच्छी तरह जानते हैं । आभार ।

के द्वारा:

उपेंदर जी ! There is a well defined and structured mechanism in the government which weighs factors, situations, facts, fictions, social impact, international impact, neighbour countries interest, freindly countries interest, enemy countries interest, financial aspect, tactical, strategical and similar more than 100 factors by logical reasoning exercise called \'APPRECIATION\'. This is not done by any politician or clerk or baboo but a team of very highly experienced people in related fields carry out several brain storming meeting. Each factor is evaluated on a scale of 1-10. The values of each factor are added up and the sum total is basis for arriving at a decision for \'yes\' or \'no\' scientifically. The outcome is put up before the competent authority may be a GOM or PM who gives the final deciscion. I give you a scenario: Country \'A\' claims part of the country \'B\' to be its own.95% population of that area has ethenin affinity to \'A\'. In that case \'A\' has upper hand in finding sympathisers to the objective of \'A\'. \'B\' has legal right to defend its area and protect those citizens who are pro \'A\' but they are a minority and cannot support openly any legal act of the Armed Forces for fear of \'S\' (sympathizers). The \'S\' are the majority and have sentimental attachment to \'A\' due to religious, linguistic, geogrfaphical, ethenic and social similarity. In such scenario, the Security Forces will never get popular support from any element of the local government because the people working at cutting edge in each and every department belong to the \'S\' which has \'A\' in the heart and \'B\' is only a body to feed them with crores of rupees of subsidy on each and every essential. In such scenario, the normal criminal law cannot be of any help to Security Forces. They will end up in fabricated litigations. They will not let you investigate things to establish the the truth. You may not have forgotten the Shopian case where two girls were raped and mudered by locals because they were informers of Police. hundereds came forword to testify that these were raped by the SP and ASP and then eleminated. Attrocities happen everywhere at equal rate. Even fathers have been convicted for raping their daughters. Here too most of the media people blame Police as if police is present in every bedroom to protect girls from their own fathers. If any Security person commits anything unlawful, that is not the policy of any type of government, democracy or other. Such things happen and will continue to happen evn if the AFSP is not there and the miscreants are prosecuted and punished. I am sure this should help you understand the issue. But I am sure also that YOU WILL NOT AGREE WITH ALL THIS becouse you already know this all but do not accept in same manner as they say, \" TELI VE TELI THERE SIR PAR KOHLU\". With thanks for your post.

के द्वारा:

अर्धसैनिक बलों और सेना को इस बात का अधिकार तो देता ही है कि वे अपराधियों को पकड़ें और अदालत में उनका दोष सिद्ध करवाकर उन्हें सजा दिलावाएं। अगर वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो इसकी दो-तीन ही वजहें हो सकती हैं, या तो कानून कमजोर है या फिर मामला फर्जी है या फिर जांच कायदे से नहीं हुई। उपेन्द्र जी अगर किसी अपराधी का न्यायलय में अपराध सिद्ध नहीं होता तो इसका मतलब यह नहीं है की वह निर्दोष है फिर यह तो न्याय पालिका का कार्य है . जहा गवाहों समेत न जाने कितने क़ानूनी दाव पेच चलते है . निरीह नागरिको को आतंक की आग में झोक कर बेदाग बाहर निकलने वाले ये दरिन्दे न्यायीक सुस्ती और मकड़ जाल का लाभ आसानी से पा जाते है

के द्वारा: rameshbajpai rameshbajpai

रमेश जी, मेरे तर्कों का मेरे पत्रकार होने से कोई संबंध नहीं। मेरे कई पत्रकार साथी, मेरी राय से इत्तेफाक नहीं रखते होंगे। क्या आपकी बात से यह माना जाए कि कश्मीर के अवाम की कोई अहमियत नहीं? अनुच्छेद 370 कोई अभी तो लागू नहीं हुआ। फिर आजादी के बाद से देश के तमाम हिसों को उनकी जरूरतों के अनुरूप विशेष सहूलियतें, सुविधाएं, रियायतें मिलती रही हैं। हम अपने ही संविधान के एक प्रावधान को अपने ही देश के खिलाफ क्यों मान लेते हैं? हमारे देश की मुश्किल यह है कि हम चीजों को अलग-अलग करके सुलझाने के बजाय सब गड्ड-मड्ड कर देते हैं। हर विरोध हमारे लिए राष्ट्रविरोधी हो जाता है। देश के अपने लोगों की अपेक्षाओं और आतंकवाद को अलग-अलग करके सुलझाना होगा।

के द्वारा: upendraswami upendraswami

पवन जी! भाई मैं कश्मीर की बात ही कहां कर रहा हूं। न मैं सेना की बात कर रहा हूं। मैं तो सिर्फ एक ऐसे कानून की बात कर रहा हूं, जिसमें सुरक्षा बलों को इस बात का अधिकार है कि वे अशांत क्षेत्र घोषित इलाके में किसी भी व्यक्ति को बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकते हैं, किसी को गोलीमारकर उसकी जान ले सकते हैं, किसी को भी बिना कारण बताए मनचाहे समय के लिए अपनी हिरासत में रख सकते हैं... इन सबके लिए उन्हें किसी कोई सफाई नहीं देनी होती, किसी के प्रति कोई जवाबदेही नहीं होती, कोर्ट के प्रति भी नहीं। क्या आप या हम पसंद करेंगे कि सवेरे घर से निकलें तो पीछे परिवार को यह तय न हो कि हम शाम को फिर घर लौटेंगे या पकड़कर बिना वजह मार डाले जाएंगे... और हमारा परिवार उसके खिलाफ कोई लड़ाई तक न लड़ सकेगा? पाकिस्तान से लड़ाई, पाकिस्तानी झंडा... ये सब इस बहस में कहां आता है?

के द्वारा: upendraswami upendraswami

सर, मुझे समझ में नहीं आता की कौन सी सर्कार ने कश्मीर की उपेक्छा की सायद कोई नहीं हमने वहा विशेष सहुलिअते दी हुर्रियत के सारे धड़े को सपोर्ट किया परन्तु वहा पाकिस्तानी झंडा क्यों वो भी जनता के हाँथ में ? सायद आप सेना के गौरव शाली अतीत को भूल गये १९६३ १९७२ १९९९ और कई अवसर पर परन्तु कमिया तो देखने पर भगवान में भी मिलाती है लेकिन कितनी वहि बात भारती सेना के विषय में भी है आप अफ़गानिस्तान देखिये वहा ब्रिटिश फौजों को देखिया इराक में सेना का अत्यचार भूल गये अगर गलती सेना करेगी तो उसको हम सजा दे सकती है परन्तु अगर कोई बिदेसी या उनका बहकाया हुआ अपना भाई जो ए के ४७ से निर्दोसो को गोली मारे सायद कोई विदेशी को,सायद आप को , सायद हम को, सायद सरहदों पे आप की रक्षा करने वाले हमारे सैनिको को तो भी आप की बात वहा बोलनी चाहिए ? मेरे हिसाब से नहीं! काया कहू आप जैसे लोगो को बुद्धजीवी कहा जाता हमें बड़बोले पन वाला, सायद आप ही है वो जो ए c में रहकर कहे की सेना बहुत गलत कर रही है चाँद पे जाने वाले टेस्टेड वैज्ञानिक भी गुस्सा करने लगते है मौहाल के कारन उन्हे वहां साक थक दिया जाता है परन्तु गल्तिया वो नहीं मौहाल कराता है बंकर में भी सायद रहने वाला गलती करे और आप देखते है की मै एक लेख लेख दू कही तो लोग जानेगे कही तो वाहवाही होगी देश की बात ही क्यों सचेंगे की पिछले ५२ साल से गरीब आदमी का पैसा कश्मीर में lag rahaa है पैसा kaise lag raha है eesapar लेख likhiye गलत या sahi तो aar achchha सर, मुझे समझ में नहीं आता की कौन सी सर्कार ने कश्मीर की उपेक्छा की सायद कोई नहीं हमने वहा विशेष सहुलिअते दी हुर्रियत के सारे धड़े को सपोर्ट किया परन्तु वहा पाकिस्तानी झंडा क्यों वो भी जनता के हाँथ में ? सायद आप सेना के गौरव शाली अतीत को भूल गये १९६३ १९७२ १९९९ और कई अवसर पर परन्तु कमिया तो देखने पर भगवान में भी मिलाती है लेकिन कितनी वहि बात भारती सेना के विषय में भी है आप अफ़गानिस्तान देखिये वहा ब्रिटिश फौजों को देखिया इराक में सेना का अत्यचार भूल गये अगर गलती सेना करेगी तो उसको हम सजा दे सकती है परन्तु अगर कोई बिदेसी या उनका बहकाया हुआ अपना भाई जो ए के ४७ से निर्दोसो को गोली मारे सायद कोई विदेशी को,सायद आप को , सायद हम को, सायद सरहदों पे आप की रक्षा करने वाले हमारे सैनिको को तो भी आप की बात वहा बोलनी चाहिए ? मेरे हिसाब से नहीं! काया कहू आप जैसे लोगो को बुद्धजीवी कहा जाता हमें बड़बोले पन वाला, सायद आप ही है वो जो ए c में रहकर कहे की सेना बहुत गलत कर रही है चाँद पे जाने वाले टेस्टेड वैज्ञानिक भी गुस्सा करने लगते है मौहाल के कारन उन्हे वहां साक थक दिया जाता है परन्तु गल्तिया वो नहीं मौहाल कराता है बंकर में भी सायद रहने वाला गलती करे और आप देखते है की मै एक लेख लेख दू कही तो लोग जानेगे कही तो वाहवाही होगी देश की बात ही क्यों सचेंगे की पिछले ५२ साल से गरीब आदमी का पैसा कश्मीर में lag rahaa है पैसा kaise lag raha है eesapar लेख likhiye गलत या sahi तो aar achchha

के द्वारा:

तो क्या हमारे लोकतंत्र की कामयाबी केवल इसमें है कि हम सेना की बदौलत देश के किसी इलाके को अपने नियंत्रण में बनाए हुए हैं, वरना वो कब का हाथ से निकल गया होता? सेना की जगह सीमा पर है, अपने नागरिकों के खिलाफ नहीं। सवाल सेना को कोसने का नहीं है, सेना तो वही कर रही है जो उसे उसके राजनीतिक आका करने को कह रहे हैं। लेकिन क्या इस हकीकत से मुंह मोड़ा जा सकता है कि एएफएसपीए का सारा इतिहास सेना की ज्यादतियों, फर्जी मुठभेड़ों और महिलाओं के साथ बलात्कार जैसी घटनाओं से भरा पड़ा है। और उसकी कोई जवाबदेही नहीं। चिंता की बात तो यही है कि इन सारी जगहों पर कामयाब तरीके से चुनाव हो चुके हैं, लेकिन फिर आपकी व्यवस्था इतनी कमजोर है कि उसकी सारी ताकत एएफएसपीए जैसे कानूनों में सिमट कर रह गई है?

के द्वारा: upendraswami upendraswami

उपेन्‍द्र भाई,  पूर्वोत्‍तर में 52 और कश्‍मीर में बीस सालों में सरकार राजनीतिक समाधान नहीं खोज पायी तो यह सरकार के साथ ही देश के हर प्रबुद्ध नागरिक की भी विफलता है। जब सरकार कमजोर साबित होने लगे तो हर देश प्रेमी बुद्धिजीवी और प्रभावशाली लोगों को समाधान के लिए आगे आना चाहिए। सेना को कोस कर और उसे शक्तिहीन कर क्‍या हम अलगाववादी मंसूबों को मजबूती नहीं देंगे ?  क्‍या यह सही नहीं है कि युवकों को सुरक्षाबलों पर हमला करने ,पत्‍थर मारने और सुरक्षाबलों को बलप्रयोग करने को उकसाने व मजबूर करने के लिए पैसे दिये जा रहे हैं  ? मणिपुर ,नगालैंड और कश्‍मीर अभी भी बचे हैं तो सिर्फ सेना की वजह से। अन्‍यथा कब के भारत से निकल गये होते। निकल गये होते तो उसके पश्‍चातवर्ती परिणामों की कल्‍पना ही की जा सकती है।

के द्वारा:

  उपेन्‍द्र जी,  किसी को भी गोली मार देने की छूट तो नहीं दी जानी चाहिए,लेकिन जब देश समाज में अस्थिरता फैलाने की सुनियोजित कोशिशें हो रही हों तो अंतिम तो शासन-प्रशासन के पास अंतिम विकल्‍प के रूप में इसके अलावा और क्‍या तात्‍कालिक वकल्‍प हो सकता है ? मैं गुवाहाटी में रहा हूं और पूर्वोत्‍तर के अलगाववादी आंदोलनों के थोडा बहुत देखा है। आम तौर ये कथित आंदोलन स्‍वत: र्स्‍फूत नहीं होते। देश के बाहर से कुछ तत्‍व इन्‍हें हवा देते रहते हैं। शायद कश्‍मीर में भी यही है। दूसरे, ऐसी स्थितियों से निपटने को सेना को ही क्‍यों आगे कर दिया जाता है। बुद्धिजीवी,कलाकार, नेता: अभिनेता, स्‍वयंभू धर्मगुरू, नेखक, पत्रकार वगैरह वहां जाकर और रुक कर स्थिति को सामान्‍य बनाने में मदद करें तो शायद अपेक्षित नतीजे जल्‍दी मिलें।

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बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट-खसोट और उसमें राजनीतिज्ञों की साठगांठ कोई नहीं बात नहीं है लेकिन आपने उस राजनीतिज्ञ की पोल खोल देने वाले आर्टिकिल को प्रकाश में लाकर वाकई अच्छा काम किया है, जो देश में यह कहते हुए दहाड़ रहा है कि विकास के आड़े अगर आदिवासी भी आए तो उनसे लोहे के हाथों से निपटा जाएगा। लेकिन उसके विकास का अर्थ साफ है- वेदांता जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विकास। इसमें कहीं कोई शक नहीं कि जंगलों से आदिवासियों का सफाया महज नक्सलियों से दो हाथ करने का मामला नहीं है, असल में जंगलों के गर्भ में दबी उन बेशकीमती खनिज संपदाओं को हथियाने का मामला है जिन पर आदिवासी कुंडली मार कर बैठे हैं और जिन्हें अपने बाप दादाओं का मानकर हिफाजत कर रहे हैं। और इस क्रम में वे नक्सलियों से भी हाथ मिला लिया है। जब देश के बुजर्ग प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि नक्सली आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं तो उनकी भी भाषा चिदंबरम जैसी ही होती है। भूलना नहीं चाहिए कि इस गैंग ने देश की खनिज-श्रम संपदा को औने पैने दामों में नीलाम करने वाली आर्थिक नीति को देश में लागू कराया था। जो सबसे अहम बात है वह यह कि यह सरकार हो या वह सरकार, देश को बेच डालने की पूंजीपतियों से पूरी सहमति है। कोई भी सरकार आए वह वही करेगी जो अटल बिहारी की सरकार ने किया या जो मनमोहन सिंह की सरकार कर रही है। अगर इस तथ्य को भुला दिया जाएगा तो चिदंबरम की करतूत देख लोगों को हैरत होगी, अटल बिहारी सरकार की कारस्तानी अविश्वसनीय लगेगी।

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उपेन्‍द्र जी, आपने ऐसे समय में वेदान्‍ता के मुददे को गरम किया है जब नियमगिरि की पहाडि़यों से बाक्‍साइड लूटने के लिये कम्‍पनी, पुलिस, न्‍यायपालिका और तो और तथाकथित चौथे खम्‍भे मीडिया ने भी अनिल अग्रवाल और चिदम्‍बरम साहब के सुरो में सुर साध लिया है। अगर इनकी चली तो वाकई नियमगिरि की पहाडि़यों में रहने वाले कोंध आदिवासी सिर्फ और सिर्फ उड़ीसा सरकार द्वारा हर वर्ष आयोजित किये जाने वाले गणतंत्र दिवस की परेड के नुमायशी रह जायेंगे। वेदान्‍ता का विरोध करना मौजूदा राष्‍ट्रीय धर्म है। वेदान्‍त का नाश होगा तभी लोकतंत्र बचेगा और देश की संप्रभुता कायम रह पायेगी। वेदान्‍त जैसे नवउपनिवेशवादी कम्‍पनियां सिर्फ लूट के लिये ही भारत आयी हैं। इसमें किसी को कोई भ्रम नहीं होना चाहिये। बाकी चिदम्‍बर जी क्‍या हैं सब जग जाहिर है-----।

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इस समय चिदंबर बाबू के रक्‍त में दौड़ रहा वेदान्‍ता का नमक बोल रहा है। बार बार आदिवासियों और गिरिजनों नक्‍सलियों को बंदरघुड़की भी शायद इसी वजह से दे रहे हैं। चिंदबर बाबू बार बार घिघियाकर अपने आकाओं से कहते ही हैं सरकार मैने आपका नमक खाया है। और आका कहते है -- बच्‍चे मेरा नाम मिटटी में मिलाय दिये। नमकख्‍वारी परंपरा है। चिदंबर बाबू परम्‍परापालक हैं। उनके गुरू जी भी। जब तक देश का चप्‍पा चप्‍पा वेदान्‍ता और दुनिया भर की मल्‍टीनेशनल कम्‍पनियों के हवाले नहीं कर देंगे चैन से नहीं बैठेंगे। चाहे इसके लिये देश में लोकतंत्र ही स्‍थगित करना पड़े।या पिफर उड़ीसा, छत्‍तीसगढ, मध्‍य प्रदेश, प बंगाल में औरतो, बच्‍चों, आदिवासियों, दलितों को नक्‍सली बोलकर मरवाना पड़े। वाह चिदंबर बाबू झकाझक सफेद कुर्ता लुंगी और काम इतना ओछा। छि छि------।

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कौन बोलेगा मुम्‍बई में। बड़े बड़े तो शरणागत हो गये। मुम्‍बई चुप रहेगी। क्‍योंकि लोग समझते हैं चुप रहने में ही भलाई है। सब सोचते है चलो ठाकरे बोलेगा उसकी सियासत का सवाल है। बोल लेने दो अपना क्‍या जाता है। हम पूरबिया तो मुम्‍बई में ऐसे ही सहमे ठिठके रहते हैं। बोले तो सलामती को खतरा है। मुम्‍बई की चुप्‍पी में सारे सियासी खेल मुकाम पर पहुंचते हैं। चाहे पवार साहब हो या चहवाण उन्‍हें इस बात की काहे चिंता होगी कि मुम्‍बई में रहने वाले बाकी देश के लोग किस तरह दहशतजदा रहते हैं। ठाकरे चाहे शाहरूख खान के खिलाफ बोले या अंबानी के। ठीकरा आम लोगों पर ही फूटता है। कहीं पर निगाहे कहीं पर निशाना। बस इंतजार करिये पेशवा की वाहिनी अब पूरबियों के खिलाफ निकलने ही वाली है। मुम्‍बई की चुप्‍पी टूटे इसकी शर्त है देश की चुप्‍पी टूटे। मुम्‍बई की हिम्‍मत टूटी हुई है। अब तो जब देश बोलेगा तभी मुम्‍बई की जुबां में जुंबिश होगी।

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नया सत्‍ता तंत्र इन्‍हीं बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनियों का बन रहा है। अकादमी के अध्‍यक्ष की औकात क्‍या है कि वे इन कम्‍पनियों की कृपा को इंकार कर सके। पुरस्‍कारलोलुपों की तादाद बढ़ रही है। रातोरात कीर्ति अर्जन की लालसा में साहित्‍यकार और संस्‍कृतिकर्मी मरे जा रहे हैं। कुछ लोगों को तो लग रहा है कि गरीब और उपेक्षित लेखकों पर बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनियों की मेहरबानी हो रही है तो बुरा क्‍या है। मगर उन्‍हें समझना चाहिए कि किसी समाज की सांस्‍कृतिक स्‍वायत्‍ता इसी तरह खत्‍म होती है। कोई भी रचनाकार इसलिये नहीं लिखता कि उसे पुरस्‍कारों से नवाजा जायेगा। उसके केन्‍द्र में उसके समय का समाज और मनुष्‍य होता है। आज के इस दौर में अगर साहित्‍यकार को यह समझ में नहीं आ रहा है कि बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनियां ही ऐसी ताकतें हैं जो सत्‍ता को धीरे धीरे कब्‍जे में लेते हुए पूरा देश कब्‍जा कर लेती हैं। हमे लगता है कि यह सर्वाधिक दुर्भाग्‍यपूर्ण हैं। हर लिखने पढ़ने वाले को इस तरह के पुरस्‍कार आयोजनों के खिलाफ मुखर होना चाहिए।

के द्वारा:

उपेन्‍द्र स्‍वामी जी महंगाई की मार से सब बेकार। मौका मिले तो पवार साहब से पूछिए कि आम आदमी जब महंगाई की मूल वजह जानता है तो ि‍फर आप और आपके कारिंदे क्‍यों नहीं। अगर जानते हैं तो ठोस उपाय क्‍यों नहीं किए जा रहे हैं। जरा उन लोगों के बारे में सोचिए जो दिनभर जीतोड़ मेहनत करने के बाद सौ रुपए या उससे कम कमा पाते हैं। घर में बूढ़े मां-बाप और बच्‍चों को मिलाकर 5-6 लोग हैं। बेचारे क्‍या खाएं और क्‍या बचाएं। यह कैसे और क्‍यों कहें कि हमारा देश विकासशील से विकसित देशों की ओर बढ़ रहा है। उपेन्‍द्र जी पञकार जमात की ही बात करें तो इनकी जिंदगी की हकीकत भी अब किसी से छिपी नहीं है। महंगाई से यह आबादी भी कराह रही है लेकिन जख्‍म और दर्द किसी से बांटना भी तो इनके लिए मुमकिन नहीं। लोग क्‍या कहेंगे। बहरहाल, महंगाई अपने पुराने दिन को लौटे तभी देश की अवाम राहत की सांस लेगी। तनाव घटेगा और घर में खुशहाली लौटेगी, चेहरे मुस्‍कुरायेंगे। वैसे आपकी फ‍िक्र वाजिब है और शायद मेरी भी -----

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के द्वारा: Upendra Swami, Jagran Upendra Swami, Jagran

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के द्वारा: pramoddwivedi pramoddwivedi

सर्वप्रथम, ब्लागिंग की दुनिया में जागरण जंक्शन नामक ब्लाग के अभ्युदय का तहेदिल से स्वागत करता हूं। इसकी सार्थकता और व्यापकता का अंदाजा तो आने वाले समय में ही हो पाएगा लेकिन इतना तो तय है कि अन्य किसी भी हिंदी के ब्लाग की तुलना में यह पाठकों-लेखकों एवं ब्लागिंग की दुनिया से खासा सरोकार रखने वालों को निराश तो कतई ही नहीं करेगा। कारण है इसका सशक्त मंच और इसके विविध स्वरूप। जागरण जंक्शन ब्लाग को जिस महामंच की संज्ञा से शुरुआती तौर पर नवाजा गया है, यह अपने नाम को खुद नहीं बल्कि इसके पाठक ही एक दिन भविष्य में इसे ब्लाग का महामंच कहने को विवश होंगे। शायद, कुछ कह सकते हैं कि यह अपने ही मंच का महिमामंडन जैसा प्रतीत होता है। लेकिन इसके पीछे मेरा मत यह है कि जिस मंच की पहुंच क्षमता पहले ही करोड़ों लोगों के बीच हो और इंटरनेट के माध्यम से जो लाखों लोगों तक दस्तक देता हो, उसके जरिए यदि कोई बात, मसला, मुद्दा, समस्याएं आदि जब पर्याप्त तरीके से रखी जाएगी, तो निश्चित ही वह एक ऐसे बिंदु पर पहुंचेगी जो निदान, समाधान का मार्ग भी सुझाएगी। किसी भी मसले पर आम जन की भागीदारी बढ़ाने एवं उसके स्तर तक पहुंचने के लिए एक वृहद् मंच की दरकार होती है, जो कि यह है। इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है। मेरे छोटे मन की समझ तो यही कहती है कि हिंदी ब्लागिंग की दुनिया में यही मंच एक सशक्त माध्यम बनेगा और रखे गए किसी भी विषय-वस्तु को सार्थकता एवं प्रभावोत्पादकता प्रदान करेगा।

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