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हमारी ‘तीसरी’ आजादी

Posted On: 18 Oct, 2010 Others में

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Mukesh Ambani's palatial 570 ft tall residence

Mukesh Ambani's palatial 570 ft tall residence

ऐसी विसंगति दुर्लभ ही होती है। इसे विसंगति न माना जाए तो यह कहा जा सकता है कि ऐसी विद्रुपता भी दुर्लभ ही है। लेकिन इसे इरादतन माना जाए तो यह भी कहा जा सकता है कि देश के करोड़ों गरीबों के साथ इस तरह का परिहास भी दुर्लभ ही है। मैं यहां एक ही दिन देश के सबसे बड़े रईस के बारे में आई दो अलग-अलग खबरों का जिक्र कर रहा हूं। दुनिया के चौथे सबसे रईस व्यक्ति हमारे देसी मुकेश अंबानी की पत्नी नीता अंबानी ने शुक्रवार शाम को लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में व्याख्यान दिया जिसमें उन्होंने कहा कि रिलायंस समूह भारत में तीसरी व असल आजादी लाना चाहता है। ऐसी आजादी जिससे देश को गरीबी से मुक्ति मिल जाए। इसकी खबर रविवार को अखबारों में छपी। रविवार को ही एक अखबार में एक अन्य खबर देखी- मुंबई के एल्टामाउंट रोड पर मुकेश अंबानी ने अपने परिवार के पांच व्यक्तियों के रहने के लिए एक बंगला.. नहीं, नहीं महल… नहीं, नहीं, नहीं… बहुमंजिला इमारत… अरे नहीं, गगनचुंबी महल बनवाया है जिसकी कीमत एकाध करोड़ नहीं (लाखों में बात तो देश के गरीब करते हैं), एकाध अरब भी नहीं…. बल्कि 44 अरब रुपये है।
भई वाह! क्या अंदाज है देश को तीसरी आजादी दिलाकर गरीबी से मुक्त करने का। गरीबों का यह रहनुमा जिस इमारत में रहने जा रहा है उसमें यूं तो महज 27 ही मंजिल हैं, लेकिन उसकी ऊंचाई एक सामान्य 60 मंजिला इमारत के बराबर है। हमारी कुतुब मीनार से ढाई गुना ऊंची 570 फुट की इस इमारत पर तीन हैलीपेड हैं, नौ लिफ्ट, एक स्वीमिंग पूल, पचास लोगों के बैठने के लिए एक सिनेमाहाल, 160 वाहनों की क्षमता वाली छह मंजिला पार्किंग, चार मंजिला झूलता बगीचा, स्पा और न जाने क्या-क्या। उसका वर्णन करना भी अश्लीलता लगती है। एंटीलिया नाम की यह इमारत बनकर तैयार है। कहा जा रहा है कि यह दुनिया का सबसे मंहगा निवास होगा। अब लोग कह सकते हैं कि पैसा मुकेश अंबानी का है, वो चाहे जैसे रहे, मुझे रश्क क्यों? मुझे इस अश्लील विलासिता से वाकई कोई रश्क नहीं। लेकिन मुझे टीस तब लगती है जब ऐसा इंसान देश से गरीबी दूर करने की बात करे।
मुझे नीता अंबानी से कोई द्वेष नहीं, लेकिन वह लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (एलएसई) में एक बड़े अहम मुद्दे पर भाषण दे रही थीं। आखिर उनकी मौजूदा योग्यताओं में देश के सबसे संपन्न व्यक्ति मुकेश अंबानी की पत्नी होने के सिवाय क्या है? उनकी रुचि शास्त्रीय नृत्य में रही और वह हमेशा से एक कुशल नृत्यांगना बनना चाहती थीं। वह मुंबई के नरसी मोंजी कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स से स्नातक रहीं। उनकी मां उन्हें चार्टर्ट अकाउंटेंट बनाना चाहती थीं, लेकिन फिलहाल उनके पास अध्यापन और इंटीरियर डिजाइनिंग की योग्यताएं हैं। वह उद्योग घरानों की ‘मानवीय’ परंपराओं का पूरी ईमानदारी से पालन करते हुए रिलायंस की तमाम गैर-व्यावसायिक शाखाओं, यथा चैरिटी, समाजसेवा, फाउंडेशन, स्कूल, मुंबई इंडियंस, आदि-इत्यादि का काम संभाल रही हैं। जाहिर है, एलएसई में उनके द्वारा परोसा गया ज्ञान उन्हें कालांतर में ससुर व पति से हासिल हुआ होगा। यह भी कहा जा सकता है कि नीता अंबानी ने वही कहा जो मोटे तौर पर रिलायंस कंपनी की सोच रही है और जिसके बदौलत वह देश की सत्ता को दखल-बेदखल करती रही है। इसलिए यह और भी ज्यादा विद्रुप है।
नीता अंबानी के व्याख्यान के शब्द गौर करने वाले हैं। उनका लहेजा वही है जो देश के किसी नीति-नियंता का होता है। उन्होंने कहा, ‘2040 तक भारत की अर्थव्यवस्था 30 से 40 लाख करोड़ डॉलर की हो जाएगी। जब ऐसा होगा तो देश गरीबी से मुक्त हो जाएगा। हम भारत में गांवों व शहरों के बीच का अंतर पाटना चाहते हैं। उसके लिए जो उद्यम शुरू करना चाहते हैं उसमें निजी क्षेत्र, सरकारी क्षेत्र, आम लोगों समेत सबका और अंतरराष्ट्रीय सहयोग लिया जाएगा…. पहली आजादी 1947 में मिली थी। दूसरी आर्थिक आजादी 1971 में मिली…,’ और तीसरी रिलायंस दिलाएगा। कैसे? देश में कई एंटीलिया खड़ी करके!
हैरानी की बात है भी और नहीं भी कि गृहप्रवेश पर होने वाली पार्टी में शायद खुद मनमोहन सिंह शिरकत करें। इन्हीं मनमोहन सिंह ने कुछ दिनों पहले कहा था कि उद्योगपतियों को युवाओं के सामने उदारता का आदर्श रखना चाहिए। उससे पहले उनकी सरकार के कंपनी मामलों के मंत्री ने देश के कॉरपोरेट मुखियाओं से अपने वेतन को नियंत्रण में रखने (उसे अश्लीलता के स्तर तक न बढ़ाने) की सलाह दी थी। लेकिन फिर हकीकत यही है कि कॉरपोरेट छू(लू)ट की नीतियां बनाने में मनमोहन सिंह की भूमिका 1991 से ही रही है।
अब अंबानी जी यह भी कह ही सकते हैं कि आखिर वह इस इमारत की देखरेख के लिए 600 लोगों का स्टाफ रख रहे हैं। अब हो गई न इन 600 लोगों की गरीबी दूर!!! मिल गई उन्हें तीसरी आजादी!!!



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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

विपिन कुमार के द्वारा
October 20, 2010

धन के ’ट्रिकल डाउन’ की गति को आंकने का कोई मान्य तौर-तरीका क्या हमारे पास है? ऐसे कौन-से उपाय हो सकते हैं जिनसे इसकी गति को तेज किया जा सके? धन के वितरण के माध्यमों में कहां-कहां अटकाव हो रहा है? इन पहलुओं पर आपसे एक लेख की अपेक्षा है। उम्मीद है कि अपने इस पुराने सहकर्मी मित्र की गुजारिश पर गौर फरमाएंगे।

subhash के द्वारा
October 19, 2010

doglapan hamari moral responsibilty hai abhi manishanker ayyer jo commonwealth ko des ka apmaan aur gulami ka symbol maan rhe the news hai ki cambridge university se maanad upadhi leker loute hai

    upendraswami के द्वारा
    October 19, 2010

    बजा फरमा रहे हैं सुभाष जी। हमारे समाज का प्रभावशाली तबका इसी दोगलेपन की कमाई खा रहा है।

Amit के द्वारा
October 19, 2010

उपेन्द्र बाबु आप जैसे लोग हर बात मे टांग अड़ाने की आदत होती है..आप शायद भूल रहे है की देश को इन सभी coporates ने ही सुधार है….आप जैसे लोगो का बस चले तो देश की लुटिया समाजवाद के नाम पर डुबो देंगे……किसी और अच्छे विषय पर लेख लिखे …और अपना नाम रोशन करे…

    upendraswami के द्वारा
    October 19, 2010

    अमित जी! मुझे अपना नाम रोशन करने की जरा भी आकांक्षा नहीं। मैं अनजाना, बेनाम ही भला। इसलिए मुझे ‘अच्छा’ विषय ढूंढकर लिखने की जरूरत भी नहीं। लिखता केवल उस मसले पर हूं जिसपर दिल करता है। अव्वल तो मैं समाजवादी नहीं, दूसरे समाजवादियों ने देश की लुटिया नहीं डुबोई, तीसरे कॉरपोरेट क्षेत्र ने देश का कम अपना सुधार ज्यादा किया है। इसके लिए आप मेरी बात पर यकीन न कीजिए, बस आकड़े उठाकर देख लीजिए कि देश में गरीबों व अमीरों के बीच खाई कितनी बढ़ी है।

    Amit के द्वारा
    October 20, 2010

    उपेन्द्र बाबु आपने आकड़े सही से नहीं देखे है …. आज से १५ साल पहले लोगो को नौकरी चिराग ले कर ढूढ़ने से भी नहीं मिलती थी और सरकारी नौकरी के चक्कर मे भ्रस्ताचारिओ के हाथ की कठपुतली बन जाते थे….और गरीबी मे जीते थे …और समाजवादी पानी से अपनी नाकामी को धोते रहते थे….गरीब सिर्फ वोह होता है जो पड़ना नहीं चाहता है…..सिर्फ समाजवाद से अपनी रोटी कमाना चाहता है….आजकल लोग समाजवाद का मतलब जानते ही नहीं है…..समाजवाद का मतलब होता है की आप खुद को पड़ा लिखा कर सबके बराबर पहुचे न की दुसरे को अपने जैसा बनाना………उम्मीद है आप अब समझ गए होंगे….एक बात और अपने ज्ञान को सिर्फ अपने तक सिमित नहीं रखे उसको फैलाते रहे ब्लॉग लिख कर ….अंजना और बेनाम से कोई फायदा नहीं…….

ashvini kumar के द्वारा
October 19, 2010

भाई उपेन्द्र जी आपकी हमारी बात हमारे आपके बीच ही रह जाएगी,और गरीब भी देश में तमाम योजनायें लागू की जाती हैं (गरीबों के लिए) ओद्योगीकरण किया जा रहा है(गरीबों के लिए ) देश में जो कुछ भी हो रहा है सारा ही गरीबों के लिए (यह गरीब है या भस्मासुर इतने प्रयत्नों के बाद भी मिटता ही नही ) एक कोशिश रिलायंश समूह भी कर रहा है?

    upendraswami के द्वारा
    October 19, 2010

    अश्विनी जी, आपकी-हमारी बात मिलेगी तो एक बुलंद आवाज तो जरूर बनेगी। उस आवाज को गुंजायमान तो करना ही होगा।

Ramesh bajpai के द्वारा
October 19, 2010

ऐसी विसंगति दुर्लभ ही होती है। इसे विसंगति न माना जाए तो यह कहा जा सकता है कि ऐसी विद्रुपता भी दुर्लभ ही है। लेकिन इसे इरादतन माना जाए तो यह भी कहा जा सकता है कि देश के करोड़ों गरीबों के साथ इस तरह का परिहास भी दुर्लभ ही है। मैं यहां एक ही दिन देश के सबसे उपेन्द्र जी मै तो मन्त्र मुग्ध सा बस पढ़ ही पाया

Ramesh bajpai के द्वारा
October 19, 2010

ऐसी विसंगति दुर्लभ ही होती है। इसे विसंगति न माना जाए तो यह कहा जा सकता है कि ऐसी विद्रुपता भी दुर्लभ ही है। लेकिन इसे इरादतन माना जाए तो यह भी कहा जा सकता है कि देश के करोड़ों गरीबों के साथ इस तरह का परिहास भी दुर्लभ ही है। मैं यहां एक ही दिन देश के सबसे उपेन्द्र जी मै तो मन्त्र मुग्ध सा बस पढ़ ही पाया tisri aajadi ka mubarak bad preshit

    upendraswami के द्वारा
    October 19, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया रमेश जी। और अच्छा लगता अगर थोड़े विचार आपने इस विषय पर रखे होते तो आपका भी मत जानने को मिलता।


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