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हाथों पर बेटी का खून

Posted On: 3 May, 2010 Others में

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यूं तो किसी का भी खून हाथों पर लेकर कोई कैसे सो सकता है लेकिन खून अपनी ही बेटी का हो तो और भी यकीन करना मुश्किल है। बेटी का दोष- उसने किसी विजातीय पुरुष के साथ प्रेम किया था। हैरत की बात है कि बर्बरता की यह पराकाष्ठा देश के पढ़े-लिखे तबके और संपन्न इलाकों में भी उसी वीभत्सता के साथ देखने को मिल रही है। यह हकीकत है कि हम ज्यादा विकसित होने के साथ ज्यादा बर्बर, ज्यादा अधीर और ज्यादा असहिष्णु हो रहे हैं। संवेदनशीलताएं खत्म हो रही, कत्ल परिष्कृत हो रहे हैं। हत्याओं को जायज ठहराने के नए-नए बहाने गढ़े जाते हैं। लोग दूसरों की लाशों पर आगे बढ़ने की कवायद में महारत हासिल कर रहे हैं। अपराध की खबरें एक जुगुप्सा के साथ नहीं बल्कि रस के साथ पढ़ी जाती हैं।
लेकिन ऐसे दौर में भी अपनी ही बेटी का धोखे से कत्ल सिहरन तो पैदा कर ही देता है। वह भी केवल इस जुर्म के लिए कि उसने अपना जीवनसाथी खुद चुना। निरुपमा पाठक दिल्ली में पत्रकार थीं तो मां की झूठी बीमारी के बहाने अपने घर कोडरमा बुलाकर परिवार वालों द्वारा उनकी हत्या खबर भी बनी और उस पर कार्रवाई होने की संभावना भी जगी। यहां तो हत्या करके परिजनों ने उसे आत्महत्या का रूप देना चाहा। लेकिन उनका क्या जो देश के कानून का मखौल उड़ाते हुए खालिस तालिबानी अंदाज में पंचायत बुलाकर सरेआम प्रेमी युगलों को मार डालने का आदेश दे देते हैं और उनके माता-पिताओं की उसमें स्वीकृति शुमार होती है। लिहाजा लोग अमानुषीय तरीके से अपनी ही संततियों को जहर दे देते हैं, फांसी पर लटका देते हैं, गोली मार देते हैं, जला डालते हैं और उस के बाद धर्म, जाति व गोत्र के नामपर हर तरीके से उसे जायज ठहराने की कोशिश करते हैं। वहीं हमारी सामाजिक-राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था केवल कोई फैसला लेने से बचने के लिए आड़ ढूंढती रहती है। यह सजा- केवल प्रेम करने के लिए? वो भी उस दौर में जब दुनिया से प्रेम लगातार कम होता जा रहा है? लेकिन इस बहस में न भी उलझूं तो मेरा मूल सवाल मुझे लगातार परेशान किए रहता है। मेरी बेटी रात में नाराज होकर सो जाए तो मुझे पूरी रात बेचैनी रहती है, फिर भला ये लोग अपनी संततियों के खून से सने हाथों के साथ कैसे सो पाते हैं?



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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bkkhandelwal के द्वारा
October 5, 2010

beti ki izaat ghar ki izaat hoti hamrey desh ke har ghar ki pratikirya hai per kya maa-baap aaj kal beti bete ko surru meie isss paribhasha ko samjha patey ki kya jaati kya dharm kya gotr hai koi nahi jab unko kaho to woh isko nazar andaz kardey tey hai sawaal asia kyun jab kisi bad´burjg ka dabab padta tab achey baurey ki paribhasha yaad dilayjati hai surru se bachoon ko english medium school meie padyajata jahan per goter dahrm ka koi sawad nahi padya jata aaj ke mdoern youg meie hum ki soch kahain aur hai beti kahan jati hai kahan kis se doti kar rahi hai kisi maa-baap per time nahi bahut kam log hi hain asiey jo iss baat ki fikar kartey honengey per jab ladki shaadi layak hoti hai aur maa-baap ki ichha per naarajgi jatati hai tab uski baat ko unsuna kardeyti hai maa-baap ko izaat ka ? lagjata hai vastav meie galat hai maa-baap ko samjh daari ley kar beti ki shadi karni chhaiye yah nahi ki uss per koi dawab dalaajaye uss per atyachar kiya jaye usko maara jayae kyun nahi socha jata aaj ke samaj meie agar beti aapki marji shaadi karley aur wahin dusri aur ladka usko nakar dey tab kya karogey kya duabara haath piley karogey tab samaj meie aapke maan sammna ka kya hoga kis muhh se sab ka samana karogey beti ko beti hi samjho parya nahi jis beti ki chintaoko leyker uske haaath piley karney ka sapna dekhthey waqu aaney per ussey maarney ka kaamkar dala yeh kaisey maa-baap hain jara si bhi sharrm nahi rahi ki beti ki hatya karkey kaise iss paaap ki mukti se punay mileygadharm ke naam per jo betiyon ko jo maar detey ho yeh kis jagh sahi tharaya gaya hai beti ki hatya karney per koi inaam nahi milega parntu ultey paap ke bhagidaar hogeyasia na karo

neeraj vashistha. के द्वारा
May 6, 2010

दरअसल यह व्‍यक्‍ित  के मन में जो कुंठा पल रहे हैं, उसी का परिणाम है। जो व्‍यक्‍ित जीवन में प्रेम ना कर पाया, प्रेम का जीवन के केनवास पर रेखाचित्र नहीं खींच पाया, वह दूसरों के जीवन में आए प्रेम का भी दुश्‍मन हो जाता है। निरूपमा की मां ने बस यही किया है। उनके जीवन में प्रेम की किरण ही नहीं उतरी, जब बेटी के जीवन में उतरा तो उसकी रोशनी से वह परेशान हो गई, लगा वह जल जाएगी, इसलिए उसने इसे बूझा दिया। प्रेम प्रसंग में जो भी हत्‍या की जाती है , उसका यही मनोवैज्ञानिक कारण मेरी समझ में आता है।

rachna varma के द्वारा
May 4, 2010

पता नही ये कैसी ममता है जो झूठी शान के लिये अपने ही सँतान का खून करने पर अमादा है

Manoj के द्वारा
May 4, 2010

उपेन्द्र जी , ऑनर किलिंग का मामला भारत में पहला नही है लेकिन हमारी सरकार तब तक नही जागेगी जब तक कोई बडी हस्ति इसका शिकार नही होती.

divya के द्वारा
May 3, 2010

आज मेरे पति ऑफिस से थके हुए घर आए, उनके खाना खाते समय बेटी रोने लगी, मैं जब तक किचन से आती, मैंने देखा कि वो बेटी को गोद में लेके बाएँ हाथ से खा रहे थे. मेरे आश्चर्य का ठिकाना न था. ये वही शख्स था जो कभी भी कोइ डिस्टर्बेंस किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं कर सकता था. तो क्या कोई पिता बेटी की गलती पे उसे समझा-बुझा कर बात नहीं मनवा सकता बजाय कि ह्त्या जैसा कदम उठा के! क्या कोई पिता बेटी की खुशी अपनी खुशी नहीं समझ सकता? यदि नहीं तो ईश्वर करे ऐसे घर में बेटी का जन्म ही ना हो.

    neetu singh के द्वारा
    May 6, 2010

    madam je agar sabhe ke soch aapke jaise ho jaye to mere vichar se duniya ke koi bhe beti dukhi nahe rahegi.

divya के द्वारा
May 3, 2010

आप ने सही लिखा है कोई कैसे अपनी बेटियो का क़त्ल कर देता है. जब हमने आप का ये ब्लॉग पढ़ा , मेरी बेटी किअसे रात में नाराज होकर सो जाए तो मुझे पूरी रात बेचैनी रहती है, फिर भला ये लोग अपनी संततियों के खून से सने हाथों के साथ कैसे सो पाते हैं?तभी मेरे मन में भी ये बात आई की कैसे कोई अपनी ही बेटी को मर सकता है .मेरी भी एक बेटी है जब मैं उस को उसके पापा की गोदी में देखती हु और उन दोनों की आखो में प्यार देखती हु तो बार बार यही मन सोचता है क्या किसी बेटी का अपराध इतना बड़ा हो सकता है की उसकी सजा कत्ल ही हो. ???????????????


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