blogid : 54 postid : 18

बाकी मुंबई चुप क्यों है?

Posted On: 2 Feb, 2010 न्यूज़ बर्थ में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

शाहरुख खान को मैं अभिनेता के तौर पर ज्यादा पसंद नहीं करता। हालांकि उनकी ज्यादातर कामयाब व चर्चित फिल्में मैंने देखी हैं। मैं उन्हें शोमैन ज्यादा मानता हूं। लेकिन उनके हाल के दो गैरफिल्मी काम या कहें तो दो टिप्पणियां मुझे बेहद पसंद आईं। एक तो जब उन्होंने खुलकर माना कि आईपीएल की नीलामी में पाकिस्तानी खिलाड़ियों के साथ नाइंसाफी हुई (हालांकि मुझे अब तक यह नहीं समझ में आया कि फिर उनकी अपनी टीम ने किसी पाकिस्तानी खिलाड़ी पर कोई दांव क्यों नहीं खेला। क्या उन्हें खुद भी भीतरी खेल का पता न था?)। दूसरी बात, जो उन्होंने आज शिवसेना से माफी मांगने से इनकार कर दिया (ज्यादा खुशी होगी अगर वे इस लड़ाई को अंजाम तक ले जाएं, बीच में न छोड़ें)।
मनोहर जोशी को आज टीवी पर यह कहते देख हैरानी हो रही थी कि बालासाहेब ने कहा है तो माफी तो मांगनी ही होगी। यह शायद भारत में ही मुमकिन है जहां कोई राजनीतिक पार्टी देश के एक नागरिक को इस तरह खुलेआम धमकी दे सकती है। लेकिन मुझे इससे भी ज्यादा हैरानी इस बात पर हो रही थी कि अब तक बॉलीवुड के किसी भी बड़े खिलाड़ी ने अपनी इंडस्ट्री के आज के दौर के इस सबसे बड़े शोमैन के समर्थन में बयान नहीं दिया। कुछ ऐसी ही हैरानी उस वक्त भी हुई थी जब मुकेश अंबानी के खिलाफ शिवसेना की बकवास पर उद्योग जगत की किसी भी बड़ी हस्ती ने मुंह नहीं खोला, जबकि लगभग सभी के मुख्य अड्डे मुंबई में ही हैं। लगता है कि शिवसेना या मनसे के पच्चीस-पचास-सौ गुंडों के पत्थरों का डर सभी को है। इसीलिए शाहरुख की तारीफ करता हूं कि उन्होंने अपने घर पर पत्थरबाजी के बाद भी रुख में नरमी पैदा नहीं की। जानता हूं कि शाहरुख की नजदीकी कांग्रेस से है और मुंबई व महाराष्ट्र में इस साऱी नफरत की जड़ में किसी न किसी रूप में कांग्रेस ने भी पानी ही डाला है, उसे पाला-पोसा है। उसके अपने स्वार्थ हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल मुझे हैरान करने वाला यही है कि आखिर बाकी मुंबई क्यों चुप रहती है? आखिर मुंबई में सारे लोग शिवसेना को वोट देने वाले नहीं हैं। शायद आधे से भी बहुत कम ही होंगे। जो शिवसेना की बीमार मानसिकता के बंधुआ हैं, उनकी बात तो समझ में आती है, लेकिन जो नहीं हैं, वे चुप क्यों हैं? क्या शिवसेना की ताकत हमारे बॉलीवुड या उद्योग जगत की साझा ताकत से भी ज्यादा है? अगर कल को अमिताभ, आमिर, सलमान, लता मंगेशकर, आशा भोंसले, दिलीप कुमार, देवानंद, जैसी हस्तियां मिलकर या मुकेश अंबानी, रतन टाटा, वाडिया, आदित्य बिड़ला जैसे उद्योगपति मिलकर शिवसेना की नातियों के खिलाफ बयान भर जारी कर दें तो क्या शिवसेना की इतनी हैसियत है कि वह इन सबकी मुखालफ़त एक साथ कर सके? लेकिन समस्या यह है कि यह वो तबका है जो अपना नफा-नुकसान पहले सोचता है। ये दोनों ही जमात ऐसी हैं जिन्होंने वक्त-वक्त पर शिवसेना के मुखिया के साथ मंच साझा किए हैं, फायदे पहुंचाए हैं, फायदे उठाए हैं। उसी के चलते मुंबई की हर ऊंच-नीच पर ठाकरे के ह बेसिर-पैर के बयान को सिर-आंखों पर लिया जाने लगा। मुंबई मतलब ठाकरे हो गई। मुंबई की ताकत बॉलीवुड है, इसीलिए स्मिता ठाकरे शिवसेना की धमक की ही बदौलत बॉलीवुड में बड़ी शख्सियत बन गई (अब भले ही वे अपने ससुर से परे जा चुकी हैं)। शिवसेना की यूनियनों की धमकी ही ज्यादातर उद्योगपतियों का मुंह बंद किए रहती है।
लेकिन बॉलीवुड और उद्योग जगत के अलावा भी तो मुंबई में लोग हैं। इसीलिए यह सवाल लगातार हैरान किए रहता है कि बाकी मुंबई चुप क्यो है?

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (7 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

14 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Anant Kumar के द्वारा
October 2, 2010

इन पर कोई कब बोलेगा ? मगध महाविद्यालय कॉलेज, चंडी, नालंदा, बिहार जहाँ १०० से भी ऊपर शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारी कार्य करते है. वहाँ के प्राचार्य तथा शासी निकाय की तानाशाही तथा मनमाने ढंग से वित का दुरूपयोग करते हुए लगभग ३५ शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारीयो का वेतन नहीँ देने के चलते उनका तथा उनके परिवार भुखमरी के कगार पर पूरी तरह से हैं तथा शेष जिनका वेतन दिया भी जाता है वह कुल वेतन का नाममात्र का ही हिस्सा होता है. जिससे उनका भी भरण पोषण नहीं हो पा रहा है. माननीय मुख्यमंत्री के द्वारा दिए जा रहे लाखो रुपये अनुदान के अधिकांश भाग को प्राचार्य तथा शासी निकाय के द्वारा वेतन के रूप में जब्त कर लिया जाता है. कुछ लोगो को उनके वेतन का एक बहुत छोटा हिस्सा ही दिया गया तथा लगभग ३५ शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारियों को पूर्णतः वेतन नहीं दिया गया. इस कॉलेज के प्राचार्य की दबंगता इतनी है की इनके दर से कोई भी कर्मचारी अपना मुह तक नहीं खोल पाता है. पैसे की कमी तथा परिवार की भुखमरी इन कर्मचारियों की नियति बन चुकी है.

omprakashshukla के द्वारा
May 17, 2010

बाकि बमई चुप इसलिए हैकि shahrukh ke natak ko dekh chuki hai ye filmi kalakar apne film ke prachar ke liye kisi had tak jasakte hai iska satik udahrad shahrukh neamerika me diya jab apne prachar ke kiye apne suracha jach ko musalman hone ki wajah se pareshan kiya jana bataya tha sabhi samjhdar log in nuotankibajo kadrama khub achi tarah janteaur samjhate hai.haranito tab hoti hai jab apjaise budhjivi bhi inlogo ke jhase me janbujkh ker ya anjane ajate hai.

Suneel Pathak, jagran के द्वारा
February 28, 2010

आपकी यह लाइनें कि लेकिन बॉलीवुड और उद्योग जगत के अलावा भी तो मुंबई में लोग हैं। इसीलिए यह सवाल लगातार हैरान किए रहता है कि बाकी मुंबई चुप क्यो है? काफी सही तरीके से पूरे मामले को कम शब्‍दों में बयां कर देती हैं।

Munish Dixit के द्वारा
February 12, 2010

sir, bilkul sahi likha hai aap nay. ager in per nakel nahi dali gayi too yeh log desh ka batwara tak kar dengay.

मनीष के द्वारा
February 11, 2010

@ Praveen: बिलकुल सही कहा आपने……….

Praveen के द्वारा
February 11, 2010

इन ठाकरे गुंडों से बात नहीं लात मरकर गोली मार देनी चाहिये . ये वो महारास्ट्र के पागल कुते है जो हर किसी इन्सान को रेबीज़ से मार डालना चाहते है . पोलिटिक्स रचा कर आपना स्वार्थ निकाल लेते है और आम भारतीय को मरने के लिए मजबूर कर देते है. आखिर कार इस देश की सरकार कुछ करती क्यों नहीं है. देश के सबसे बड़े देश द्रोही तो यही है जो अन्दर ही अन्दर देश का बटवारा करदेना चाहते है.

ashok choudhary के द्वारा
February 10, 2010

कौन बोलेगा मुम्‍बई में। बड़े बड़े तो शरणागत हो गये। मुम्‍बई चुप रहेगी। क्‍योंकि लोग समझते हैं चुप रहने में ही भलाई है। सब सोचते है चलो ठाकरे बोलेगा उसकी सियासत का सवाल है। बोल लेने दो अपना क्‍या जाता है। हम पूरबिया तो मुम्‍बई में ऐसे ही सहमे ठिठके रहते हैं। बोले तो सलामती को खतरा है। मुम्‍बई की चुप्‍पी में सारे सियासी खेल मुकाम पर पहुंचते हैं। चाहे पवार साहब हो या चहवाण उन्‍हें इस बात की काहे चिंता होगी कि मुम्‍बई में रहने वाले बाकी देश के लोग किस तरह दहशतजदा रहते हैं। ठाकरे चाहे शाहरूख खान के खिलाफ बोले या अंबानी के। ठीकरा आम लोगों पर ही फूटता है। कहीं पर निगाहे कहीं पर निशाना। बस इंतजार करिये पेशवा की वाहिनी अब पूरबियों के खिलाफ निकलने ही वाली है। मुम्‍बई की चुप्‍पी टूटे इसकी शर्त है देश की चुप्‍पी टूटे। मुम्‍बई की हिम्‍मत टूटी हुई है। अब तो जब देश बोलेगा तभी मुम्‍बई की जुबां में जुंबिश होगी।

Ritesh Kumar, Bihar के द्वारा
February 5, 2010

गिदर का जब मौत आता है तो वो शहर की ओर भागता है ओर आज वही दस ठाकरे परिवार का है. लेकिन वो ये नहीं सोचते को उनके लिए तो कहीं भागने का भी जगह नहीं है. भगवन के यहाँ देर है अंधेर नहीं. इस कलयुग में आप जो करते हो उसका फल भी इसी जनम में मिल जाता है.

sumit के द्वारा
February 4, 2010

पुराने समय में एक रिवाज था की कुत्ता पागल हो जाये तो तो उसे गोली मार देनी चाहिए ..शिवसेना और मनसे aise ही पागल कुत्ते है.बल ठाकरे में इतना दम है तो उत्तर प्रदेश आकर दिखाए..

M. Yunus के द्वारा
February 4, 2010

उपेन्द्र जी ठीक kaha आपने बाकि मुम्बे चुप क्यों हे दरअसल आज हर इंसान सिर्फ अपना फायेदा देखता हे . जबकि उसे खुद नहीं मालूम के अगला नंबर उसका आने वाला हे क्योकि चुप रहने से शिव सेना के गुंडों की हिम्मत और बढ़ जाती हे और वो ए दिन अपनी गुंडा गर्दी से देश का सर शर्म से झुकाते हे जो ज़हर वो आज घोल रहे हे उसका असर धीरे धीरे होगा और हमारे देश को खोकला कर देगा कही देर न हो जाए आओ उठ खड़े हो और इसे गुंडों का मुकाबला करे क्योके अगला नंबर आपका ही हे सबको मिलकर इसे घिरिणित काम के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए

Anand Rai, Jagran के द्वारा
February 3, 2010

उपेन्‍द्र सर, वाकई शाहरुख खान ने हिम्‍मत दिखायी है। वैसे मुझे यही लगता है कि वोट की राजनीति में बाला साहब और राज ठाकरे जैसे लोग मौके बे मौके ऐसी राग अलापते रहते हैं। अगर मुम्‍बईकर खुलकर अपनी परंपरा का निर्वाह करने लगे तो इनकी जबान पर ताले लग जायेंगे, लेकिन हर कोई तभी बोलता है जब उसकी फटे में कोई टांग अडाता है।

ravikant, Muzaffarpur के द्वारा
February 3, 2010

upendra je, sau phisdi such kha, agle post ka intjar

seema के द्वारा
February 3, 2010

मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ. मैं भी शाहरुख़ की कोई फेन नहीं हूँ; लेकिन उनकी हिम्मत की दाद देना चाहूंगी. मुंबई का ये दुर्भाग्य है की यहाँ के लोग इन चाँद गुंडों के डर से चुप्प हैं. पर उससे भी ज्यादा दुःख इस बात का है, की यहाँ की सर्कार इतनी निकम्मी है की सब कुछ देखते-सुनते भी कुछ नहीं कर रही. जब तक गुंडों में कानून का डर नहीं पैदा होगा; ऐसी गीदड़ धमकियाँ देते रहेंगे ये लोग और जनता के डर को भुनाते रहेंगे.

indu के द्वारा
February 2, 2010

वाकई यह बात हैरान करने वाली है। मीडिया खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इतना प्यार क्यों करती है शिव सेना और सामना जैसे पत्रों से. कौन पढ़ता है उनके संपादकीय, पता नहीं…..कम से कम अमिताभ बच्चन की तुलना में शाहरुख में कुछ दम तो है। अमिताभ तो जया के कुछ बोल देने के बाद माफी मांगते नजर आ रहे थे।


topic of the week



अन्य ब्लॉग

  • No Posts Found

latest from jagran